आकाश शुक्ला।

रायपुर। Naidunia Weekly Column Sehatnaama: छत्‍तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में ग्रामीण चिकित्सा सहायक और नेत्र सहायकों के बीच एक-दूसरे का विरोध तो जगजाहिर है। नियुक्ति और कामकाज से लेकर वेतन जैसी चीजों के लिए भी कर्मचारी नेता स्वस्थ्य विभाग को समय-समय पर पत्र लिखकर आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग करते रहते हैं, लेकिन कर्मचारी नेता द्वारा भेजे जा रहे पत्र उनके लिए अब मुसीबत बन सकती है। दरअसल, नेत्र सहायक संघ केएक पदाधिकारी ने आरएमए केखिलाफ विभाग को लगातार पत्र लिखा। इसमें कई नियुक्ति और कार्य को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए। अब स्वास्थ्य संचालक ने उनकेपत्र केआधार पर लगाए गए उन आरोपों को बिंदुवार कर पांच दिनों केभीतर साक्ष्य प्रस्तुत करने के निर्देश दे दिए हैं। यदि सहायक संघ द्वारा इस संबंध में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया तो उनकेखिलाफ ही कार्रवाई केलिए भी कह दिया गया है। यह आरोप पत्र ही नेत्र सहायक संघ के लिए मुसीबतें बढ़ा दी है।

डीन के लिए जुगत, कांटे भी कम नहीं

चिकित्सा शिक्षा संचालक का प्रभार रायपुर मेडिकल कालेज के डीन को मिलने के बाद अब जल्द स्थाई पदस्थापना के लिए भी शासन से पत्र जारी हो सकता है। इसके लिएजहां कुछ डाक्टर्स लाबी डीएमई का पद आइएएस अधिकारी को देने से बेहतरी की बात कर रहे हैं तो वहीं इसी पद को लेकर उठा-पटक भी देखी जा रही है। कुछ वरिष्ठ चिकित्सक समेत पूर्व अधीक्षक भी दावेदार बताए जा रहे हैं। चिकित्सकों में जिस तरह से माहौल चल रहा है, उनमें अधिकांश पूर्व अधीक्षक केकामकाज को देखते हुए डीन केरूप में देखना चाहते हैं। मगर उन्होंने दुश्मन भी कुछ ऐसे बना रखे हैं, जो उनकी राह में कांटे बिछाने को पहले से ही तैयार हैं। इसमें आइएमए के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी भी हैं, जिन्होंने साफ तौर पर स्वास्थ्य विभाग केआला अधिकारी से इनकी नियुक्ति को कठघरे में खड़े करने की बात कह दी है।

विशेषज्ञों से ले रहे टेबल का काम

शासकीय सेवारत दर्जनों चिकित्सा विशेषज्ञ अस्प्तालों में सेवाओं से इतर कार्यालयीन कामकाज में रूचि दिखाते हुए यहां पदस्थ हो गए हैं। वहीं जिलों से अटैचमेंट के लिए लगातार आवेदन भी आते रहते हैं। कई चिकित्सा विशेषज्ञों की मंत्रालय (इंद्रावती भवन, नया रायपुर) में काम होने का हवाला देते हुए अटैचमेंट कई अधिकारियों का अब रास नहीं आ रहा है। उनका तर्क है कि अस्पतालों में जहां एक ओर चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी आ रही है। वहीं, अनुभवी विशेषज्ञों को मंत्रालय में पदस्थ कर सिर्फ बाबूओं की तरह का काम ले लिया जाता है। इसके विपरीतयहां काम करने के दौरान 25 फीसद नान प्रैक्टिस अलाउंस अलग से देते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य व्यवस्था तो प्रभावित हो ही रहा है। सरकार को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसे लेकर नान मेडिकल और मेडिकल कर्मियों केटकराव और अंदरूनी अनबन भी लगातार सामने आ रहे हैं।

नियमित और संविदा में ठनी

जिला स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों में नियमित और संविदा कर्मचारियों में अनबन की बातें आ रही है। एक कर्मचारी का कहना था कि संविदा कर्मचारी कामकाज में अधिक एक्टिव हैं, जबकि कुछ को छोड़ दें तो नियमित कर्मचारी अपने स्तर का काम सही तरह से नहीं कर पा रहे हैं। स्वाभाविक रूप से स्वास्थ्य अधिकारी का भी झुकाव काम करने वालों पर ज्यादा देखने को मिल रहा है। ऐसे में कुछ नियमित कर्मचारी अपने को उपेक्षित समझने लगे हैं। काम को लेकर अंदरूनी कलह कुछ यूं आ रही। कहा जा रहा है कि ऐसे कर्मचारी अब स्वास्थ्य अधिकारी केलिए ही लाबिंग करने में लगे हैं, लेकिन संगठित होकर इस तरह की गतिविधियां भी कहा टिकने वाली है। अंतत: अपने काम को तो साबित करना ही पड़ता है। अनबन और आपसी अनबन के बीच खाली समय में चर्चा का एक बड़ा विषय बना हुआ है।

Posted By: Kadir Khan

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