रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। राष्ट्रीय जनजातीय साहित्य महोत्सव के अंतिम दिन भोपाल के कलाकारों ने 'लमझना" काव्य नाटक की प्रस्तुति दी। नाटक गोंड जनजाति की मान्यताओं और परंपरा का आधारित था। नाटक की शुरुआत में पृथ्वी की उत्पत्ति, जीव जगत की सृष्टि, देवलोक की स्थापना आदि को कलाकारों ने प्रस्तुत किया।
इसके बाद गोंड नायिका जमोला और नायक बदरू के माध्यम से आदिवासी जीवन और उनके संघर्षों को प्रस्तुत किया गया। कहानी में जहां एक ओर जमोला और बदरू की प्रेमकथा है। वहीं दूसरी ओर इस काव्य नाटक में जनजातीय कलाकारों ने पारंपरिक सैला और करमा नृत्य की प्रस्तुति दी। नाटक के लेखक लक्ष्मीनारायण पयोधि हैं। ज्योति दुबे के निर्देशन में नाटक का मंचन हुआ।
तीन दृश्य के माध्यम से समझिए कहानी।
क्या है 'लमझना"
'लमझना" गोंड, बैगा, कोरकू आदि जनजातियों में घर जमाई बनाने के लिए वर के चयन की प्रथा है। इसके अनुसार बेटी के लिए एक ऐसे युवक को घर में रखकर परखा जाता है, जो परिवार की जिम्मेदारी संभाल सके।
दृश्य- 1
बुधरू और जमोला की प्रेमकथा शुरू होती है जंगल से
नाटक के अनुसार सुकमन अपनी बेटी जमोला के लिए बुधरू को लमझना बनाकर लाता है। बुधरू घर के सारे काम अपने भावी ससुर के बताए अनुसार करने की कोशिश करता है। वह एक संकोची स्वभाव का युवक है, जो अपने काम में लगा रहता है। बुधरू और जमोला के साथ हाट-बाजार और जंगल में महुआ बीनने जाता है। धीरे-धीरे जमोला बुधरू से मन-ही-मन प्रेम करने लगती है।
दृश्य-2
काम पर खरा नहीं उतरा बुधरू
जमोला का पिता सुकमन कठोर स्वभाव का है। वह बुधरू के हर काम को बड़ी बारीकी से देखता है। फिर बुधरू उसकी कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इस कारण उसे वापस उसके घर भेज देता है।
दृश्य-3
जमोला पिता से करती है विद्रोह
जब जमोला को इस बात का पता लगा तो वह पिता से विद्रोह करती है और अपने प्रेम को वापस पाना चाहती है। तभी बुधरू गांववालों को शेर से बचाकर सुकमन के दिल में जगह बना लेता है और सुकमन राजीखुशी से बुधरू का विवाह जमोला से करा देता है।