
रायपुर। ऐसा घर, जहां सुबह उठते ही बहुएं सभी के लिए लजीज खाना तैयार करती हों, बच्चे दादा-दादी की कहानियां और लोरी सुनकर बड़े होते हों और रात के खाने के वक्त घर के सभी सदस्य साथ बैठकर दिनभर की बातें एक-दूसरे से शेयर करते हों, इसे कहते हैं संयुक्त परिवार। लेकिन संयुक्त परिवार अब घटते जा रहा है। एकल परिवार के बढ़ते चलन ने बच्चों से उनका बचपना, बड़ों का प्यार और आशीर्वाद सबकुछ छीन लिया है। इसके बावजूद राजधानी में आज भी कुछ ऐसे परिवार हैं जो संयुक्त रूप से रह रहे हैं। लगभग 30 से 35 सदस्यों वाले ऐसे परिवार से नईदुनिया ने 'संयुक्त परिवार दिवस' के अवसर पर बात की जिससे पता चला कि उनका आपसी प्यार ही परिवार को बांधे रखा है और वे खुशहाल हैं। किसी परिवार के मुखिया ने समय को साथ खुद को बदला तो किसी परिवार ने कुछ प्रथाओं ने नहीं मानने की ठान ली तो किसी परिवार ने सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दी, जिससे आपसी प्यार और बढ़ गया।
चार पीढ़ियों का है हमारा परिवार
फैशन हाउस के ओनर मगनलाल अग्रवाल बताते हैं कि लगभग 30 सदस्यों का उनका परिवार है, जिसमें चार पीढ़ी एक साथ रह रही है। श्री अग्रवाल ने बताया कि हमारे पिताजी स्व. रूलीराम का सपना था कि पूरा परिवार साथ-साथ हंसी खुशी रहे। इसी के चलते आज हम सभी साथ मे हैं। हम चार भाइयों के साथ ही उनके बच्चे और बच्चों के बच्चे सभी एक ही घर में रहते हैं। परिवार का आपसी प्यार क्या होता है, ये हम अपने घर में ही देखते हैं। काम के बाद घर पहुंचते हैं तो बच्चों से भरा पूरा परिवार सारी थकान दूर कर देता है। चाहे कोई त्योहार हो या पारिवारिक उत्सव, सभी एक साथ मनाते हैं।
सभी को पूरी स्वतंत्रता
14 सदस्यों के संयुक्त परिवार के मुखिया लोकचंद बजाज बताते हैं-मेरे तीन बेटे, बहुओं और उनके बच्चों का संयुक्त परिवार है। पिछले 40 सालों से हमारा पूरा परिवार रायपुर में रह रहा है। चावल की फैक्ट्री से मैंने यहां अपने काम की शुरुआत की और फिर लड़कों ने स्टील का काम शुरू किया। शुरू से ही मैंने और मेरी पत्नी ने अपने लड़कों को काम, पढ़ाई के लिए पूरी आजादी दी थी और यह भी फैसला किया था कि हम अपनी बहुओं को भी पूरी तरह से स्वतंत्र रखेंगे। यही कारण है कि आज पूरा परिवार हंसी-खुशी साथ रहता है। हर साल हम पूरे परिवार के साथ कहीं बाहर टूर पर जाते हैं। बच्चों का जन्मदिन हो या किसी बेटे-बहू की सालगिरह, सभी मिलकर सेलिब्रेट करते हैं।
समय के साथ बदला खुद को
35 सदस्यों के परिवार में रहने वाले घर के बड़े बेटे संजय मिश्रा बताते हैं- मेरे पिता स्व. देवीशंकर मिश्रा और मम्मी देवकी मिश्रा ने शुरू से ही पूरे परिवार को बांध कर रखा था। इसका सबसे बड़ा कारण है कि उन्होंने समय के साथ हमको बदलने के बजाय खुद को बदला। पिताजी हमेशा कहा करते थे कि पुराने समय में जो परदा प्रथा चल रही थी, उसे हम अपनी बहुओं पर बिल्कुल भी लागू नहीं होने देंगे। पिताजी और माताजी के ऐसे ही सहयोग के चलते हमारे घर की महिलाएं घर के काम के साथ ही जॉब भी कर रही हैं। मेरे चाचा के बहुओं को मिलाकर हमारे परिवार में 8 बहुएं हैं, पर इतने सालों में कभी उनके बीच किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई। जब पिताजी थे तो उन्होंने पूरे परिवार को और विशेषकर घर की महिलाओं को काफी महत्व दिया है। अब मां और सभी चाचा भी इसी आधार पर चलते हैं।