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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 22, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Raipur Column Nagarghadi: टीकाकरण में बनाया रिकॉर्ड लेकिन लापरवाही कहीं पड़ न जाए भारी

Raipur Column Nagarghadi: रावण के बहाने प्लास्टिक नाश के तमाशे से लेकर सत्ता और विपक्ष के विरोध के तरीकों पर श्रवण शर्मा ने खुलकर लिखा।

By Shashank.bajpaiEdited By: Shashank.bajpai
Publish Date: Fri, 22 Oct 2021 10:30:00 AM (IST)Updated Date: Fri, 22 Oct 2021 10:30:52 AM (IST)
Raipur Column Nagarghadi: टीकाकरण में बनाया रिकॉर्ड लेकिन लापरवाही कहीं पड़ न जाए भारी

श्रवण शर्मा, रायपुर। Raipur Column Nagarghadi: कोरोना का टीका लगने का रिकार्ड भले ही बनता जा रहा हो, लेकिन अभी भी हजारों की भीड़ में शामिल होना घातक हो सकता है। पिछले दिनों रावण दहन के आयोजनों में नियम टूटे और हजारों लोग उमड़े। बिना मास्क पहने लापरवाही बरतते हुए भीड़ में घुसे। आयोजन वाले दिन प्रशासन ने किसी को नहीं रोका और आयोजन खत्म होने के बाद नोटिस भी नहीं भेजा, जबकि गाइडलाइन में कड़े नियम बनाए गए थे कि मैदान में केवल दो हजार लोगों को प्रवेश मिलेगा।

थर्मल स्क्रीनिंग, मास्क अनिवार्य था। मगर नियम धरे के धरे रह गए। बुद्धिजीवियों का कहना है कि भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों के पर्व, त्योहार पर भीड़ उमड़ती है, पर्व, त्योहार पर छूट मिले किंतु फिलहाल सख्ती जरूरी है, ऐसी छूट न मिले कि लोग एक दूसरे पर पिल पड़ें। बंदिशों से ही बीमारी पर काबू पाया था, अब ऐसी लापरवाही भारी पड़ सकती है।


रावण के बहाने, प्लास्टिक का नाश

सदियों से बुराइयों के प्रतीक केरूप में हर साल रावण का पुतला दहन किया जा रहा है। उम्मीद की जाती है कि लोग कुछ सीख लेंगे और बुराइयों का त्याग करेंगे। इस बार दशहरा पर एक सामाजिक संस्था ने प्लास्टिक रूपी बुराई को हमेशा के लिए त्यागने का आह्वान किया और प्लास्टिक का रावण जलाया। संस्था ने संदेश दिया कि यदि हर कोई प्लास्टिक का उपयोग न करने का स्वयं संकल्प ले, तभी प्लास्टिक रूपी बुराई का अंत हो सकता है।

यह एक अच्छी पहल है, लेकिन केवल प्लास्टिक का रावण जलाने मात्र से ही समस्या खत्म नहीं होगी। जब बुराई के प्रतीक रावण को जलाने के बाद बुराई कभी खत्म नहीं हुई तो भला एक या दो प्रयासों में प्लास्टिक रूपी बुराई का खात्मा कैसे होगा? सरकार चाहे तो एक ही दिन में यह बुराई खत्म हो सकती है, पर आज भी सारा दोष जनता पर मढ़ा जाता है।

हारे हुए नेताओं का छलका दर्द

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की थी। यदि कुछ बागी नेता भीतरघात नहीं करते तो शायद और भी कुछ सीटें कांग्रेस की झोली में आ जाती। जिन नेताओं ने कांग्रेस को धोखा दिया, उनमें से कई नेता तो आज संगठन के उधा पदों पर आसीन हैं और मनमानी भी कर रहे हैं। यह आरोप विधानसभा चुनाव में हारने वाले कांग्रेसी नेताओं का है। हारने वालों ने तीन साल बाद अपना गुट बनाकर विरोध जताया है।

अपने आपको छाया विधायकों की संज्ञा देते हुए चेतावनी दी है कि संगठन में शामिल मतलबी नेताओं को संगठन के पदों से हटाया जाए। इससे पार्टी में खलबली मच गई है। जनता भी नेताओं की नौटंकी पर मजे ले रही है। दो माह से मुख्यमंत्री बदलने पर चल रही खींचतान पर लगाम नहीं लगी, अब छाया विधायकों की धमकी से सत्ता पर काबिज नेताओं की नींद उड़ गई है।

विरोध का अजब तरीका

स्थानीय समस्याओं को हल न कर पाने पर भाजपा नेता सत्ताधारी कांग्रेस पर निशाना साधते हैं। उधर, केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा डीजल, पेट्रोल और गैस की कीमतों पर नियंत्रण न कर पाने के लिए कांग्रेसी प्रदर्शन करने से पीछे नहीं हटते। पिछले तीन सालों से यही खेल चल रहा है। राजधानी में इस बार एक नया प्रदर्शन आम जनता ने देखा। कांग्रेस केयुवा नेता थाल में रुपये रखकर पेट्रोल खरीदने पंपों पर पहुंचे।

यहां पेट्रोल भरवाने आये लोगों की नजर उतारी और कामना की कि भविष्य में स्थिति सुधर जाए। पेट्रोल भरवाने पहुंचे आम युवाओं ने तंज कसा कि यह खेल तो सालों से खेला जा रहा है। कभी भाजपा ने प्रदर्शन करके सत्ता पर कब्जा किया था। अब भाजपाई चुप बैठ गए हैं और कांग्रेसी नेताओं को मौका मिला है, जनता बेचारी तो पहले भी दुखी थी और अभी भी दुखी है। जनता का दर्द नेता कहां समझते हैं।