
नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। भारतीय हिप-हॉप और रैप संगीत के फलक पर जब भी चर्चा होती है, तो अमूमन दिल्ली, पंजाब या मुंबई के 'गली बॉयज' का नाम जेहन में आता है। लेकिन इस चमक-दमक से अलग, मध्य भारत की आदिवासी संस्कृति, हरे-भरे जंगलों और लोक-परंपराओं को हिप-हॉप के वैश्विक मंच पर स्थापित करने वाले छत्तीसगढ़ के पहले रैपर चेतन चांडक उर्फ 'एप्पी राजा' का रायपुर स्थित एम्स (AIIMS) अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद असमय निधन हो गया। महज 32 वर्ष की उम्र में उनके इस दुनिया से जाने से छत्तीसगढ़ के संगीत जगत और युवाओं में शोक की लहर है।
एप्पी राजा ने पारंपरिक छत्तीसगढ़ी बोली को रैप के साथ इस कदर पिरोया कि उन्होंने क्षेत्रीय संगीत के मायने ही बदल दिए।
एक बेहद साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे एप्पी राजा का जीवन किसी संघर्षमयी सिनेमाई कहानी जैसा था। जब उन्होंने इस क्षेत्र में कदम रखा, तब छत्तीसगढ़ के लोग पंडवानी, भरथरी और कर्मा जैसे पारंपरिक लोकगीतों के रस में डूबे थे और 'हिप-हॉप' जैसी पश्चिमी विधा से पूरी तरह अनजान थे। ऐसे माहौल में ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषा में रैप तैयार करना एक बड़ा कूटनीतिक और कलात्मक जोखिम था। शुरुआत में उन्हें समाज और अपनों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि लोगों को लगता था कि इस क्षेत्रीय भाषा में रैप कभी कामयाब नहीं हो सकता।
साधनों की कमी एप्पी राजा के जुनून के आगे कभी दीवार नहीं बन सकी। महंगे रिकॉर्डिंग स्टूडियो और हाई-टेक उपकरणों के अभाव में उन्होंने अपने मोबाइल और साधारण ईयरफोन की मदद से ही गानों की कंपोजिंग और रिकॉर्डिंग शुरू की। उन्होंने रायपुर और बस्तर की जमीनी हकीकत को करीब से देखा और स्थानीय युवाओं की बेरोजगारी, सुख-दुख और छत्तीसगढ़िया अस्मिता को अपने शब्दों के जरिए सुर दिए।
एप्पी राजा को असल कामयाबी तब मिली जब बस्तर की अनूठी संस्कृति और लोक-रंग को समेटे उनके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। उनके रैप की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे अन्य रैपरों की तरह अश्लीलता या पैसों के दिखावे से दूर रहते थे। वे अपने गानों में किसानों के मुद्दों, मिट्टी की खुशबू और लोक-कला को प्राथमिकता देते थे। उनके इस 'बस्तरिया स्वैग' ने ऐसा जादू बिखेरा कि जो भाषा कभी गांवों तक सीमित मानी जाती थी, वह बड़े-बड़े म्यूजिक कॉन्सर्ट और क्लबों में गूंजने लगी।
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नाम और शोहरत मिलने के बाद भी एक स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) कलाकार होने के नाते उनका वित्तीय संघर्ष कभी खत्म नहीं हुआ। क्षेत्रीय स्तर पर मुख्यधारा के म्यूजिक कॉपोर्रेट्स से आर्थिक सहयोग न मिल पाने के कारण उनके कई बड़े प्रोजेक्ट्स फंड्स की कमी से जूझते रहे। इस मानसिक और आर्थिक तनाव के बावजूद उन्होंने कभी संगीत से मुंह नहीं मोड़ा।
आज भले ही एप्पी राजा का सफर असमय थम गया हो, लेकिन छत्तीसगढ़ में आज जो रैप कल्चर फल-फूल रहा है, उसकी मजबूत नींव एप्पी ने अपने संघर्षों से ही रखी थी। उन्होंने प्रदेश के युवाओं को अपनी मातृभाषा पर गर्व करना सिखाया और वे हमेशा छत्तीसगढ़ के 'रैप किंग' के रूप में याद किए जाएंगे।