रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि
साधु की आंख ग्रंथ-शास्त्र होते हैं। परमात्मा की आज्ञाएं शास्त्रों में लिपिबद्घ हैं। साधु जितना शास्त्र का अध्ययन करेंगे उतना ही प्रवचनों में लौटा पाएंगे। जितने शास्त्र ज्ञाता बनेंगे, उनकी वाणी में निखार आएगा। वे आंतरिक शत्रुओं राग, द्वेष, ईर्ष्या, कषाय से दूर रहने प्रेरित करेंगे। साधु-साध्वियों, संतों का कर्तव्य है कि वे जगवासियों को भक्ति मार्ग पर चलने की राह दिखाएं। उक्त विचार विवेकानंद नगर स्थित श्री संभवनाथ जैन मंदिर में जैनाचार्य विजय कीर्तिचंद्र सूरीश्वर महाराज ने व्यक्त किए।
परमात्मा की आज्ञा स्वीकार करो
आचार्यश्री ने कहा कि परमात्मा की आज्ञा पालन से तीन गुण जीवात्मा को तत्काल मिलते हैं। पहला सद्गुण की प्राप्ति, परंपरा हमारे गुण में आती है। दूसरा वास्तविक सुख की उपलब्धि, हमें संपूर्ण सुख प्राप्त होता है। तीसरा मानसिक शांति उपलब्ध होती है। परमात्मा की आज्ञा स्वीकार लो तुम्हें सद्गुरु मिल जाएंगे। परमात्मा की आज्ञा कठिन नहीं है। आज्ञा को सुनने के बाद उसे स्वीकारना और अपने जीवन में उतारना कठिन है।
श्रमण-श्रमणी पाठशाला खुले
आचार्यश्री ने शास्त्र अध्ययन को जैनशासन के लिए जरूरी बताते हुए कहा कि इसके लिए श्रमण-श्रमणी पाठशाला खोली जानी चाहिए, जहां जैन साधु-साध्वी शास्त्रों का अध्ययन कर सकें। एक घंटे का प्रवचन मनोरंजन के लिए नहीं, मनोमंथन के लिए होना चाहिए। यह साधुओं की भाषण कला की बाजीगरी से नहीं, शास्त्रों के गहन अध्ययन-मनन से प्राप्त होगी।