
आनंदराम साहू, रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 105 किलोमीटर दूर पहाड़ावाली चंडी माता का मंदिर घुंचापाली, बागबाहरा में स्थित है। यहां इस नवरात्र पर्व पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। महासमुंद जिले में ज्यादातर देवी मंदिर पहाड़ियों पर दुर्गम स्थान पर हैं। घुंचापाली गांव की पहाड़ावाली तंत्रोक्त चंडी माता का मंदिर पहाड़ी में स्थित होते हुए भी सुगम है। चट्टानों के बीच ढलाननुमा पहाड़ी में बच्चे-बड़े, बुजुर्ग और महिलाएं सभी आसानी से माता दरबार तक पहुंच सकते हैं। भक्त यहां पहुंचकर माता के भव्य स्वरूप का दर्शन कर रहे हैं।
आदिशक्ति जगदम्बा भवानी चंडी स्वरूप में यहां विराजित हैं। श्रद्घालुओं की ऐसी मान्यता है कि यह विशाल पत्थर की स्वयंभू मूर्ति निरंतर बढ़ रही है। इसके चलते मंदिर को कई बार तोड़ना पड़ा। यहां इस समय क्वांर नवरात्र पर्व में भक्तों की लंबी कतार लग रही है। यह वही मंदिर है, जहां वर्षों से भालू आते हैं और माता को अर्पित प्रसाद ग्रहण करते हैं।
महासमुंद जिले में ज्यादातर देवी मंदिर पहाड़ों में स्थित हैं इनमें चंडी माता घुंचापाली के अलावा ऐतिहासिक खल्लारी माता मंदिर, नेशनल हाइवे-53 किनारे स्थित बावनकेरा का मुंगईमाता, पटेवा के पास स्थित पतईमाता और नवागांव के पास स्थित छछानमाता देवी मंदिर प्रमुख रूप से शामिल हैं।
इनमें खल्लारी, पतई और मुंगईमाता को रिश्ते में बहन माना जाता है। इन तीनों पहाड़ियों की दूरी इतनी है कि एक पहाड़ी पर चढ़कर दूसरी पहाड़ी को आसानी से देखा जा सकता है। ऐसी किवदंतियां भी हैं कि ये माताएं एक दूसरे को पर्व विशेष पर पुकारती हैं। यहां सच्चे मन से मन्नत लेकर आने वाले भक्तों की हर मुराद पूरी होती है।
घुंचापाली स्थित चंडी माता और बावनकेरा स्थित मुंगईमाता पहाड़ी में भक्तों को रोज भालू भी दिखते हैं। ये जंगली भालू यहां जन आस्था का केंद्र बने हुए हैं। सैकड़ों भक्तों के बीच आने और हाथ से प्रसाद ग्रहण करने के बावजूद किसी को नुकसान नहीं पहुंचाने को लेकर लोग धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं। इसे दैवीय चमत्कार मानकर ग्रामीण और भक्त इन भालुओं की भी पूजा करने लगे हैं।