
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर: वन विभाग द्वारा पिछले दो दशकों से जिन वन भैंसों को शुद्ध नस्ल बताकर संरक्षण-संवर्धन पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, वे हाइब्रिड निकले। दस दिन पहले इन्हीं हाइब्रिड वन भैंसों को उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व से करीब 100 किलोमीटर दूर बाहर छोड़ दिया गया।
जानकारी के अनुसार इन्हें ओडिशा में छोड़ा गया, ताकि वे वापस न लौट सकें। इस पूरे मामले ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वन्य जीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने आरोप लगाया कि विभाग को शुरू से ही इन भैंसों के हाइब्रिड होने की जानकारी थी। वर्ष 2007 में आशा नामक मादा भैंस को शुद्ध नस्ल बताकर लाया गया, जबकि बाद में खरीदी गई रंभा और मेनका के दस्तावेज़ों में उन्हें क्रास ब्रीड दर्ज किया गया था। इसके बावजूद वर्षों तक इन्हीं से पैदा हुए बच्चों को “वन भैंसा संरक्षण” की सफलता के रूप में प्रचारित किया गया।
पोल तब खुली जब केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने असम के शुद्ध नस्ल वन भैंसों के साथ इनके प्रजनन की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद अक्टूबर 2023 में इन्हें बाड़ा तोड़कर भागने की कहानी बताई गई। जंगल से सटे गांवों में फसल नुकसान हुआ, लेकिन मुआवज़ा देने से विभाग ने हाथ खड़े कर दिए।
आंकड़ों के अनुसार 2013-14 से 2024-25 तक इन भैंसों पर 2.46 करोड़ रुपये खर्च किए गए। सिंघवी ने पूरे मामले की हाई-पावर कमेटी से जांच कराने और दोषी अधिकारियों से खर्च की वसूली की मांग की है। साथ ही वर्ष 2020 में लिए गए निर्णयों पर भी प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) से जवाब मांगा गया है।