
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर। बंगाल की जीत में 'छत्तीसगढ़ मॉडल' गेमचेंजर साबित हुआ। भाजपा ने ममता की 'लक्ष्मीर भंडार' (1500 रुपये) के जवाब में महिलाओं को 3000 रुपये प्रति माह देने का जो मास्टरस्ट्रोक खेला, उसकी पटकथा छत्तीसगढ़ की 'महतारी वंदन योजना' की सफलता को देखकर लिखी गई थी। बंगाल की सियासत में आए ऐतिहासिक बदलाव ने दिल्ली से लेकर रायपुर तक राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।
ममता बनर्जी के जिस अभेद्य किले को भेदना नामुमकिन माना जा रहा था, उसे छत्तीसगढ़ के रणनीतिकारों ने अपनी 'साइलेंट वर्किंग' से ध्वस्त कर दिया। इस जीत के बाद अब उपमुख्यमंत्री व गृहमंत्री विजय शर्मा, भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय और पूर्व विधायक सौरभ सिंह जैसे नेताओं का कद राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ना तय माना जा रहा है।
बिहार राज्यसभा चुनाव में अपनी कार्यक्षमता दिखा चुके गृहमंत्री विजय शर्मा बंगाल में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार बनकर उभरे। शाह के 15 दिवसीय प्रवास के दौरान विजय शर्मा उनकी 'स्पेशल ड्यूटी' पर थे। उनके साथ बस्तर के कद्दावर नेता महेश गागड़ा ने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा किया, जिसने टीएमसी के कैडर को बैकफुट पर धकेल दिया।
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संगठन मंत्री पवन साय पिछले आठ महीनों से बंगाल में जमे हुए थे। 60 से अधिक विधानसभा सीटों पर संगठन की जड़ें गहरी करने का श्रेय उन्हें जाता है। वहीं, कलकत्ता को अपना वार-रूम बनाकर सौरभ सिंह ने 52 शहरी सीटों पर कमान संभाल रखी थी। इन नेताओं ने न केवल रणनीति बनाई, बल्कि मतगणना के आखिरी मिनट तक मोर्चे पर डटे रहे। अनुराग सिंहदेव और दयाल दास बघेल जैसे नेताओं ने घर-घर जाकर फॉर्म भरवाए, जिससे साइलेंट वोटर भाजपा की ओर झुक गया।