32 साल की उम्र में ही डूब गया छत्तीसगढ़ी हिप हॉप के जनक का सितारा, बस्तरिया स्वैग वाले रैपर एप्पी राजा का निधन
छत्तीसगढ़ी हिप-हॉप संगीत के पुरोधा और मशहूर रैपर एप्पी राजा के जीवन, उनके कड़े संघर्षों और असमय विदाई से उनके प्रशंसकों में गहरा दुख है। अपनी मातृभाषा ...और पढ़ें
By Paritosh DubeyEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Tue, 16 Jun 2026 11:49:04 AM (IST)Updated Date: Tue, 16 Jun 2026 11:49:04 AM (IST)
एप्पी राजा को श्रद्धांजलि देती हुई एआई निर्मित तस्वीर। नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। जब भी भारतीय हिप-हॉप और रैप संगीत की बात होती है, तो अक्सर मुंबई की गलियों (गली बॉय) या दिल्ली-पंजाब के चमक-दमक वाले स्टूडियो की याद आती है। लेकिन इस चकाचौंध से दूर, मध्य भारत के जंगलों, धान के खेतों और आदिवासी संस्कृति की खुशबू समेटे छत्तीसगढ़ की माटी से एक ऐसी आवाज उठी, जिसने रैप संगीत की परिभाषा को ही बदल दिया। वह आवाज थी छत्तीसगढ़ के चहेते रैपर एप्पी राजा की। एप्पी राजा उन रैपरों में शामिल थे जिन्होंने पहली बार ठेठ छत्तीसगढ़ी बोली को हिप-हॉप के वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
फिल्मी कहानी सा जीवन
32 साल की उम्र में अंतिम सांस लेने वाले ऐप्पी राजा का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा। एक बेहद साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे एप्पी को बचपन से ही संगीत और शब्दों को लय में पिरोने का शौक था। जब उन्होंने रैप संगीत को अपना करियर बनाने की सोची, तब छत्तीसगढ़ में हिप-हॉप शब्द से भी लोग वाकिफ नहीं थे। लोग पारंपरिक लोकगीतों (जैसे पंडवानी, भरथरी और कर्मा) को ही सुनते थे। ऐसे में एक बिल्कुल नए और पश्चिमी संगीत विधा को अपनी क्षेत्रीय भाषा में ढालना एक बहुत बड़ा जोखिम था।
न स्टूडियो, न उपकरण
शुरुआती दौर में एप्पी राजा को अपनों और समाज के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों का मानना था कि छत्तीसगढ़ी भाषा में रैप कभी सफल नहीं हो सकता। लेकिन एप्पी के भीतर अपनी भाषा और अपनी मिट्टी के लिए कुछ कर गुजरने का एक अनोखा जुनून था। उनके पास न तो महंगे रिकॉर्डिंग स्टूडियो के लिए पैसे थे और न ही बड़े स्तर पर गानों को प्रमोट करने के साधन। उन्होंने अपने मोबाइल फोन और सस्ते इयरफोन की मदद से ही गानों को कंपोज और रिकॉर्ड करना शुरू किया। रायपुर और बस्तर की गलियों में घूम-घूमकर उन्होंने स्थानीय युवाओं की नब्ज को टटोला और उनके सुख-दुख, बेरोजगारी, और छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान को अपने गानों का विषय बनाया।
बस्तरिया स्वैग से बढ़ाई फैन फालोइंग
एप्पी राजा को असली पहचान तब मिली जब उनके छत्तीसगढ़ी रैप वीडियो सोशल मीडिया पर धूम मचाने लगे। बस्तर की संस्कृति को दर्शाते रैप्स ने रातों-रात इंटरनेट पर धूम मचा दी। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे रैप में अश्लीलता या दिखावे के बजाय अपनी संस्कृति, लोक-कला, और किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाते थे। देखते ही देखते, जो भाषा केवल गांवों तक सीमित समझी जाती थी, उसे एप्पी ने देश के बड़े-बड़े क्लबों और म्यूजिक कंसर्ट्स में गूंजने पर मजबूर कर दिया।
स्वतंत्र कलाकार के नाते जूझे संकट से
सफलता मिलने के बावजूद एप्पी राजा का जमीनी संघर्ष कभी खत्म नहीं हुआ। एक स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) कलाकार होने के नाते उन्हें लगातार वित्तीय संकट से जूझना पड़ा। क्षेत्रीय कलाकारों को मुख्यधारा के उद्योग से वह सहयोग और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल पाती, जिसके वे हकदार होते हैं। कई बार बेहतरीन प्रोजेक्ट्स सिर्फ इसलिए अटक जाते थे क्योंकि उनके पास फंड नहीं होता था। इस मानसिक और आर्थिक तनाव के बीच भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और आखिरी सांस तक नए-नए गानों के जरिए दर्शकों का मनोरंजन करते रहे।
छत्तीसगढ़ में रैप कल्चर की नींव रखी
एप्पी राजा भले ही हमारे बीच नहीं हैं और उनका यह सुरीला सफर असमय थम गया, लेकिन छत्तीसगढ़ी हिप-हॉप के क्षेत्र में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने छत्तीसगढ़ के हजारों युवाओं को अपनी मातृभाषा पर गर्व करना और उसमें कुछ नया करने का हौसला दिया। आज प्रदेश में जो रैप कल्चर फल-फूल रहा है, उसकी नींव एप्पी राजा के संघर्षों से ही तैयार हुई थी। वे हमेशा छत्तीसगढ़ के 'रैप किंग' के रूप में याद किए जाएंगे।
एम्स में हुआ निधन
छत्तीसगढ़ी रैप संगीत को नई पहचान दिलाने वाले युवा कलाकार चेतन चांडक उर्फ एप्पी राजा का लंबी बीमारी के बाद रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। उनके असामयिक निधन से संगीत प्रेमियों और युवाओं में शोक की लहर दौड़ गई है।