
रायपुर। क्या आज भी समाज में बेटियां स्वीकार नहीं हैं, क्या बेटे की चाह में बेटियों का गला घोटा जा रहा है, क्या 21वीं सदी-आधुनिक विचारधारा की यही परिभाषा है? जी हां, ये सारे सवाल इसलिए, क्योंकि नवजात अनाथ बच्चों की संख्या शहर में बढ़ती चली जा रही है, जिनमें बेटियों की संख्या अधिक है।
बीते 3 महीने में शहर के अलग-अलग हिस्सों में 3 नवजात बेटियां मिली हैं, जिन्हें जन्म देने वाली मां या अन्य परिजनों ने मरने के लिए कभी खुले मैदान में फेंक दिया तो कभी झाड़ियों के बीचोबीच, लेकिन जिंदगी इनके नसीब में लिखी और समय पर लोगों ने इन्हें देखकर अस्पताल पहुंचा दिया, जहां ये तीनों बच्चियां स्वस्थ्य हैं।
इनमें से एक बच्ची तीन महीने की हो चुकी है, दूसरी सवा महीने की और तीसरी को मिले 2 दिन ही हुआ है। अंबेडकर अस्पताल में मिली बच्ची का पता अगर अस्पताल प्रशासन चाहे तो लगा सकता है और निर्दयी माता-पिता तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक तो इस मामले में पुलिस भी सुस्त पड़ी हुई है।
'नईदुनिया' पड़ताल में सामने आया कि अकेले डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल में सालाना 17-20 अनाथ बच्चे (जिनमें नवजात की संख्या सर्वाधिक होती है) पहुंचते हैं। और इनमें फीमेल चाइल्ड अधिक होती हैं। वहीं समता कालोनी में मातृ-छात्रा संस्थान की स्थापना साल 2006 में हुई, जिसके बाद से अब तक 4महीने से लेकर 5साल तक के 84 बच्चे पहुंचे हैं। वर्तमान में 60 बच्चे संस्थान में है।
जानकार मानते हैं, इन वजहों से छोड़ देते में मां-बाप अपनी संतानें
- अवैध संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को।
- बेटे की चाह रखने वाले दम्पति।
- बहुत कम मामलों में आर्थिक स्थिति भी एक वजह।
केस-1
जगह- एमपी ढाबा के पास, टाटीबंध
तारीख- 6 नवंबर 2013
- टाटीबंध स्थित एमपी ढाबा के पास एक नवजात बच्ची लावारिस हालत में पड़ी हुई थी। गुजरते लोगों ने उसे देखा, तत्काल संजीवनी एम्बुलेंस के माध्यम से मासूम को डॉ. अंबेडकर अस्पताल पहुंचाया, जहां उसका इलाज किया गया। बच्ची पूरी तरह से स्वस्थ्य है और उसे नर्सरी में रखा गया है। जल्द ही उसे मातृ-छाया संस्थान में शिफ्ट किया जाएगा।
केस- 2
जगह- गोल्डन ट्यूलिप के पीछे, वीआईवी रोड
तारीख- 11जनवरी 2014
- होटल के पीछे झाड़ियों से यहां काम करने वाले मजदूरों को बच्चे के रोने के आवाज सूनाई दी। जब मजदूर वहां पहुंचे तो महज कुछ ही घंटे की बच्ची पड़ी हुई थी। उसका कॉड भी नहीं कटा हुआ था। पुलिस को सूचना दी गई, मौके पर पहुंची तेलीबांधा थाना पुलिस ने मासूम को डॉ. अंबेडकर अस्पताल पहुंचाया। बच्चियों को चींटियों ने भी काटा था। फिलहाल बच्ची स्वस्थ्य है।
केस-3
जगह- डॉ. अंबेडकर अस्पताल के अंदर सीढ़ियों पर, जेल रोड
तारीख- 16फरवरी, 2014
- अस्पताल के दूसरे माले पर सीढ़ियों में रविवार की शाम 7बजे बच्ची लावारिस हालत में पड़ी, रो रही थी। डॉक्टर्स ने भी बताया कि बच्ची दो दिन की है, वह स्वस्थ्य है। हालांकि डॉक्टर बच्ची किसकी है, पता लगाने का जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं, इसे पुलिस की पड़ताल का विषय बता रहे हैं। जबकि बड़ी आसानी से मासूम के परिजनों तक पहुंचा जा सकता, करना सिर्फ इतना होगा कि 2 दिन में जितने भी बच्चे पैदा हुए, उनके परिजनों से बात करनी होगी। नाम-पता अस्पताल में है।
फीमेल चाइल्ड की संख्या ज्यादा
साल में 15-20 नवजात, अनाथ बच्चे अस्पताल पुलिस या फिर अन्य एनजीओ के माध्यम से पहुंचाए जाते हैं। यहां उनके स्वस्थ्य का परीक्षण करने के बाद मातृ-छाया संस्थान में भेजने की कानूनी प्रक्रिया की जाती है। अभी हमारे पास 3 बच्चियां हैं, तीनों को जन्म के कुछ ही घंटों के अंदर अस्पताल लाया गया था। ऐसा नहीं हैं कि सिर्फ फीमेल चाइल्ड ही सबसे ज्यादा अनाथ स्थिति में मिलते हैं, मेल भी मिलते हैं, लेकिन फीमेल की संख्या ज्यादा है। 60-40 का प्रतिशत मान सकते हैं।
डॉ. वीरेंद्र कुर्रे, प्रभारी, ऑर्फन बेबी, शिशुरोग विभाग, डॉ. अंबेडकर अस्पताल