
नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करने की संभावनाओं और उसके कानूनी ढांचे पर विचार-विमर्श का दौर शुरू हो गया है। राजधानी रायपुर के पुराने सर्किट हाउस में राज्य स्तरीय उच्च स्तरीय समिति द्वारा आयोजित परामर्श बैठक में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने अपनी अनूठी रूढ़िगत परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक स्वायत्तता की रक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।
सामाजिक प्रतिनिधियों ने स्पष्ट मांग रखी कि आदिवासी समुदाय को प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाए। समिति ने विभिन्न सामाजिक संगठनों से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत, भरण-पोषण और लिव-इन संबंधों से जुड़े नियमों पर विस्तार से रायशुमारी की।
परामर्श बैठक के पहले सत्र में रानी दुर्गावती जागृति महिला मंडल की महिला प्रतिनिधियों ने जनजातीय समाज के अधिकारों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की वैवाहिक व्यवस्था, संपत्ति का विभाजन और सामाजिक परंपराएं सदियों से अपनी रूढ़िगत प्रथाओं और प्रथागत कानूनों से संचालित होती रही हैं। यूसीसी का समान नियम लागू करने से उनकी मौलिक पहचान और संवैधानिक सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। प्रतिनिधियों ने आग्रह किया कि यदि राज्य में नागरिक संहिता का कोई भी प्रारूप तैयार किया जाए, तो उसमें जनजातीय समाज की विशिष्ट संस्कृति, जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों और सामाजिक ताने-बाने को अक्षुण्ण रखा जाए।
बैठक के दूसरे सत्र में अन्य समुदायों के प्रतिनिधियों ने भी अपने विचार साझा किए। इस दौरान मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, गोंडवाना और सतनामी समाज के प्रमुखों ने हिस्सा लिया। विचार-विमर्श के केंद्र में विवाह पंजीयन की अनिवार्यता, पैतृक संपत्ति में समान उत्तराधिकार, भरण-पोषण के नियम और लिव-इन संबंधों के नियमन जैसे महत्वपूर्ण विषय रहे। सभी समुदायों ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों और अपने-अपने व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) के व्यावहारिक पहलुओं से समिति को अवगत कराया।
बैठक में समिति के वरिष्ठ सदस्य एवं पूर्व आईएएस अधिकारी एम.के. राउत, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार और ज्योतिरानी सिंह ने सभी सामाजिक प्रतिनिधियों के सुझावों को बिंदुवार सुना। बैठक के दौरान एक तकनीकी प्रस्तुतीकरण के माध्यम से समान नागरिक संहिता के कानूनी प्रावधानों, मौजूदा कानूनों और इसके संभावित पहलुओं की जानकारी भी साझा की गई। समिति के सदस्यों ने सभी पक्षों को आश्वस्त किया कि प्राप्त सभी सुझावों, आपत्तियों और जमीनी व्यावहारिकताओं का गहन कानूनी विश्लेषण किया जाएगा।
समान नागरिक संहिता का सीधा प्रभाव राज्य के प्रत्येक नागरिक के निजी और पारिवारिक जीवन पर पड़ता है। ऐसे में कानून बनने से पूर्व सभी धर्मों, वर्गों और विशेषकर जनजातीय समूहों के साथ यह संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। समिति का उद्देश्य एक ऐसा संतुलित और समावेशी कानूनी मसौदा तैयार करना है, जो सभी नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करते हुए सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा दे सके।