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छत्तीसगढ़ में UCC के एलान से गरमाई सियासत, आदिवासी अधिकारों पर कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने, उत्तराखंड मॉडल पर टिकी निगाहें

छत्तीसगढ़ में UCC लागू करने के एलान के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है।

By Sandeep TiwariEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Sat, 18 Apr 2026 11:20:01 AM (IST)Updated Date: Sat, 18 Apr 2026 11:20:01 AM (IST)
छत्तीसगढ़ में UCC के एलान से गरमाई सियासत, आदिवासी अधिकारों पर कांग्रेस-भाजपा आमने-सामने, उत्तराखंड मॉडल पर टिकी निगाहें
अरुण साव और दीपक बैज की फाइल फोटो

HighLights

  1. UCC एलान से प्रदेश की सियासत में गर्माहट बढ़ी
  2. आदिवासी अधिकारों को लेकर कांग्रेस ने सरकार को घेरा
  3. BJP ने यूसीसी को समानता का माध्यम बताया

राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर: विष्णु देव साय सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के ऐलान के साथ ही प्रदेश की सियासत गरमा गई है। राज्य की करीब 32 प्रतिशत आदिवासी आबादी के हितों और उनके संवैधानिक अधिकारों को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। कांग्रेस जहां इसे आदिवासी परंपराओं पर प्रहार बता रही है, वहीं भाजपा इसे सामाजिक समरसता का मार्ग मान रही है।

संवैधानिक कवच और यूसीसी का अंतर्विरोध

प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों में आदिवासियों का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 में से 29 और लोकसभा की 11 में से चार सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं। कांग्रेस का आरोप है कि संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के तहत आदिवासियों को जो विशेष स्वायत्तता मिली हुई है, यूसीसी उसे कमजोर कर सकती है।


विपक्षी दल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार से स्पष्टता मांगी है कि क्या नया कानून लागू होने के बाद आदिवासियों के सामुदायिक भूमि अधिकार और संरक्षित जनजातियों (जैसे बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा) को मिलने वाला संरक्षण यथावत रहेगा।

BJP का रुख: समानता और सुरक्षा का भरोसा

दूसरी ओर, राज्य सरकार और उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने इन आशंकाओं को भ्रम करार दिया है। सत्तापक्ष का तर्क है कि यूसीसी का उद्देश्य किसी की संस्कृति को नष्ट करना नहीं, बल्कि अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप समानता लाना है। भाजपा नेतृत्व का दावा है कि उत्तराखंड की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी आदिवासी समुदायों की विशिष्ट परंपराओं और रीति-रिवाजों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है। सरकार के अनुसार, यह कानून तुष्टिकरण की राजनीति को समाप्त कर सामाजिक समरसता को बढ़ावा देगा।

उत्तराखंड मॉडल पर टिकी नजरें

सियासी गलियारों में उत्तराखंड में लागू यूसीसी की चर्चा भी जोरों पर है, जहां आदिवासी समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। वहां उन्हें विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे निजी कानूनों में अपनी पुरानी परंपराओं को पालन करने की छूट दी गई है। अब छत्तीसगढ़ में भी यह बहस तेज है कि क्या साय सरकार उत्तराखंड की तर्ज पर आदिवासियों को छूट देगी या कोई नया स्वरूप सामने आएगा।

महिला आरक्षण और जनकल्याण की दिशा

यूसीसी के साथ-साथ उपमुख्यमंत्री साव ने केंद्र सरकार की 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और 'लखपति दीदी' जैसी योजनाओं का हवाला देते हुए महिला सशक्तिकरण को प्राथमिकता बताया है। आगामी दिनों में लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर होने वाली चर्चा को भी इसी दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। फिलहाल, यूसीसी को लेकर कांग्रेस इस मुद्दे को 'जनचौपाल' और ग्रामीण अभियानों के जरिए जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।

यूसीसी लागू होगा तो ये होगा

  • विवाह: विवाह की न्यूनतम आयु और विवाह के नियम सभी के लिए एक समान होंगे।
  • तलाक: तलाक की प्रक्रिया और उसके आधार सभी समुदायों के लिए एक जैसे होंगे।
  • उत्तराधिकार: पैतृक संपत्ति में पुत्र और पुत्री के अधिकारों के साथ-साथ विरासत के नियम भी समान होंगे।
  • गोद लेना: बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया और पात्रता में धार्मिक भेदभाव नहीं रहेगा।

क्या है UCC?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) में यह प्रविधान किया गया है कि राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यदि ये लागू हुआ तो व्यक्तिगत कानूनों का एकीकरण हो सकेगा। अभी देश के उत्तराखंड और गोवा को छोड़कर बाकी सभी जगह अलग-अलग धर्मों के लोग अपने-अपने व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते हैं। जैसे हिंदुओं, सिखों, जैनियों और बौद्धों के लिए हिंदू कोड बिल लागू है।

मुसलमानों के लिए शरिया कानून और ईसाइयों और यहूदियों के लिए उनके अपने विशिष्ट कानून लागू होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यूसीसी लागू होने पर ये सभी अलग-अलग कानून समाप्त हो जाएंगे और सभी नागरिकों के लिए एक ही कानून होगा।

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