श्रवण शर्मा व गिरीश वर्मा, रायपुर। वर्तमान दौर में हर हाथ में मोबाइल होने से बच्चे, युवा, महिलाओं, बुजुर्गों में फोटो खींचने का शौक पनपा है। हर वक्त जेब में मोबाइल होने से तुरंत फोटो खींचकर इंटरनेट मीडिया में अपलोड करके लाइक, कमेंट्स ज्यादा से ज्यादा हासिल करने की होड़ शुरू हो गई है। लेकिन, कुछ सालों पहले फोटो खींचने के ऐसे भी शौकीन थे, जिनके पास कैमरा होता था। वे ऐसे अवसर की तलाश में रहते थे जब कहीं खूबसूरत नजारा दिखे तो वे उसे कैमरे में कैद कर सकें। शहर में फोटो खींचने के कुछ शौकीन तो ऐसे भी हैं जो एक अच्छी फोटो खींचने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाने में भी नहीं हिचकते थे। विश्व फोटोग्राफी दिवस (world photography day) पर ऐसे ही कुछ शौकिया फोटोग्राफरों और उनके खींचे गए फोटो की जानकारी दे रहे हैं।
कला-संस्कृति से मिली प्रेरणा
वरिष्ठ फोटोग्राफर दीपेंद्र दीवान 22 वर्षों से फोटोग्राफी कर रहे हैं। वे बताते हैं कि कला, संस्कृति और प्रकृति की सुंदरता ने उन्हें फोटोग्राफी के लिए प्रभावित किया। वे हर समय अपने पास कैमरा रखते थे, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, झारखंड, कर्नाटक जहा-जहां गए वहां की कला, धरोहरों को अपने कैमरे में कैद किया। विविध राज्यों की कला, संस्कृति, पर्यावरण, पक्षी एवं वन्य जीव, धरोहरों, ट्राइबल लाइफ, रूरल लाइफ, स्ट्रीट फोटोग्राफी ने खास पहचान दिलाई।
ग्रामीण जीवन से हुए प्रभावित
फोटोग्राफर शिशिर दास ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के जनजीवन से प्रभावित हुए। वे बताते हैं कि जिस गांव से भी गुजरता, वहां का रहन, सहन, वेशभूषा को अपने कैमरे में कैद करने घंटों रूक जाता था। 25 साल में उन्होंने सैकड़ों फोटो खींची, जो आज भी उनके पास सहेजकर रखी गई है। नई पीढ़ी को भी फोटो खींचने के गुर सिखाते हैं।
लोगों ने किया पसंद तो शौक चढ़ा परवान
अखिलेश भरोस बताते हैं कि उन्हें बचपन से फोटोग्राफी का शौक था। एक कैमरा खरीदकर फोटो खींचने लगे, लोगों ने पसंद किया तो यह शौक परवान चढ़ता गया। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में जाकर फोटो खींचते थे। नए लोगों को भी सिखाकर रोजीरोटी कमाने और पुरस्कार दिलाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
आदिवासियों की फोटो से पहचान मिलने का अहसास
धनेश्वर साहू बताते हैं कि जब वे बस्तर, सरगुजा जैसे क्षेत्रों में गए तो वहां के आदिवासियों को देखकर अहसास हुआ कि उनकी फोटो से अच्छी पहचान मिल सकती है। आदिवासियों के नृत्य, विवाह जैसे आयोजनों की बाट जोहते। आदिवासी जनजीवन की फोटो देखकर लोग अचंभित रह जाते हैं।
बचपन से था फोटोग्राफी का शाैक
तात्यापारा निवासी 28 वर्षीय रजत उरकुरकर बताते हैं कि 2008 से शौकिया तौर पर फोटोग्राफी शुरू की। घरवालों के समक्ष फोटोग्राफी में भविष्य बनाने की इच्छा जताई तो काफी डांट सुनीं। पढ़ाई पर ध्यान देने की हिदायत मिली। घर वालों से छुपकर फोटोग्राफी जारी रखी। आखिर मेहनत रंग लाई। महंगा कैमरा खरीदा और वाइल्ड फोटोग्राफी करने अनेक शहरों में गया।
लठमार होली की फोटो से मिली पहचान
लिली चौक निवासी भावेश सिंह चौहान बताते हैं कि भारतीय संस्कृति को लेकर फोटोग्राफी करना पसंद है। इसके लिए वे देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर फोटो खींचते हैं। आठ वर्षाें से फोटोग्राफी कर रहे हैं। इस काम से संतुष्टि मिलती है। मथुरा, वृंदावन में होली के नजारे को कैमरे में कैद करने वे अक्सर जाते हैं। लठमार होली की फोटो खींचने पर उन्हें विशेष प्रशंसा मिली।
फ्रांस ने की थी विश्व फोटोग्राफी दिवस की घोषणा
शहर के फोटोग्राफर दीपेंद्र दीवान बताते हैं कि फोटोग्राफी इतिहास के अनुसार 9 जनवरी 1839 को फोटोग्राफी का आविष्कार हुआ था। दो वैज्ञानिक जोसेफ नाइसफोर और लुइस डागेर ने आविष्कार किया था। फ्रांस सरकार ने 19 अगस्त, 1839 में विधिवत घोषणा की थी। इस दिन की याद में प्रत्येक वर्ष 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जा रहा है।