
नईदुनिया प्रतिनिधि, कोंटा। तेलंगाना में माओवादी संगठन को एक और बड़ा झटका लगा है। माओवादी पार्टी के टॉप लीडर और लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की वांछित सूची में शामिल बरसा देवा उर्फ सुक्का ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया है। यह सरेंडर ऐसे समय में सामने आया है, जब चार राज्यों में फैले माओवादी नेटवर्क पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अभी तक तेलंगाना पुलिस की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन स्थानीय वरिष्ठ अधिकारियों और खुफिया तंत्र से जुड़े विश्वसनीय सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है।
सूत्रों के मुताबिक, बरसा देवा पहले से ही पुलिस की हिरासत में था और बीते कुछ दिनों से उससे पूछताछ की जा रही थी। बताया जा रहा है कि उसने चार राज्यों छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में से किस राज्य में सरेंडर किया जाए, इस पर काफी लंबे समय तक मंथन किया। आखिरकार अंतिम निर्णय के बाद उसे कोठागुडेम जिला पुलिस की एस्कॉर्ट में लाया गया, जहां उसने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण किया। पुलिस सूत्रों का कहना है कि कल शनिवार को इस संबंध में आधिकारिक घोषणा की जा सकती है।
पुलिस से जुड़े सूत्रों ने बताया कि बरसा देवा ने माओवादी टॉप कमांडर हिडमा के एनकाउंटर से पहले ही सरेंडर करने का मन बना लिया था। हालांकि, हिडमा के एनकाउंटर के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई। सूत्रों का दावा है कि उस पर कुल 50 लाख रुपये का इनाम घोषित था और वह लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था।
विश्वसनीय जानकारियों के अनुसार, बरसा देवा ने सीधे संपर्क करने के बजाय बिचौलियों के माध्यम से चार राज्यों की पुलिस से संवाद स्थापित किया था। लंबी बातचीत और शर्तों पर चर्चा के बाद आखिरकार उसने तेलंगाना में सरेंडर करने का फैसला लिया। बताया जा रहा है कि इस दौरान सुरक्षा और कानूनी प्रक्रिया को लेकर कई स्तरों पर बातचीत हुई।
बरसा देवा छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पूवर्ती गांव का निवासी है। वह हाल ही में एनकाउंटर में मारे गए माओवादी कमांडर हिडमा के साथ लगभग डेढ़ दशक तक सक्रिय रहा। संगठन के भीतर उसकी पहचान एक रणनीतिक और फील्ड ऑपरेशनों में सक्रिय नेता के रूप में रही है। जब PLGA (पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) की पहली नंबर बटालियन के कमांडर हिडमा को सेंट्रल कमेटी में प्रमोट किया गया, तब पार्टी ने उसकी जिम्मेदारियां बरसा देवा को सौंपी थीं।
बाद में उसे स्टेट मिलिट्री कमीशन की भी अहम जिम्मेदारी दी गई। दरभा डिवीजनल कमेटी के सेक्रेटरी पद से लेकर पहली बटालियन के कमांडर तक का उसका सफर माओवादी संगठन के भीतर काफी अहम माना जाता रहा है। इस दौरान उसने कई बड़े और चर्चित ऑपरेशनों में सक्रिय भूमिका निभाई। छत्तीसगढ़ पुलिस के अनुसार, उस पर CRPF के जवानों की हत्या से जुड़े कई मामलों में संलिप्तता के आरोप हैं। यही वजह है कि वह सुरक्षा एजेंसियों के लिए लंबे समय से एक बड़ा टारगेट बना हुआ था।
केंद्र सरकार द्वारा ऑपरेशन कगार शुरू किए जाने के बाद से माओवादी संगठन पर दबाव लगातार बढ़ा है। लगातार एनकाउंटर, शीर्ष नेतृत्व का नुकसान, बड़े पैमाने पर सरेंडर, हथियारों की बरामदगी और अन्य कार्रवाइयों ने माओवादी संगठन की फील्ड-लेवल इकाइयों को बुरी तरह प्रभावित किया है। पुलिस का कहना है कि इन कार्रवाइयों के कारण डिवीजनल कमेटियां और स्क्वॉड बिखरने की स्थिति में पहुंच गए हैं।
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छत्तीसगढ़ पुलिस सूत्रों के मुताबिक, हिडमा के एनकाउंटर के बाद स्क्वॉड कमांडर, पार्टी एरिया कमेटी के सदस्य, स्क्वॉड के आम सदस्य और मिलिशिया स्तर तक भारी भ्रम की स्थिति बनी। इसी भ्रम और डर के माहौल में कई कैडरों को यह लगने लगा कि सरेंडर करना ही उनके लिए सुरक्षित विकल्प है। बरसा देवा का आत्मसमर्पण इसी कड़ी का सबसे बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए सिविल लिबर्टीज कमेटी के तेलंगाना अध्यक्ष और महासचिव ने एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। उन्होंने मांग की है कि तेलंगाना पुलिस की हिरासत में मौजूद बरसा देवा को तत्काल कोर्ट में पेश किया जाए। उन्होंने यह भी दावा किया कि उसके साथ 15 अन्य लोग भी हिरासत में हैं और दो दिन पहले ही उन्हें तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा के पास पकड़ा गया था।