
नईदुनिया न्यूज़, सुकमा। मतांतरण के बढ़ते प्रभाव से अपनी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को लेकर जनजातीय समाज की चिंता अब ग्राम सभा के निर्णयों में दिखाई देने लगी है। सुकमा जिले के पोलमपल्ली क्षेत्र के पुनपल्ली में दो अक्टूबर को हुई ग्राम सभा ने चर्च निर्माण, प्रार्थना सभा और ईसाई मतांतरित व्यक्तियों के शव दफनाने के लिए ग्राम सभा की जमीन नहीं देने का निर्णय किया है। ग्राम पंचायत के सूचना पटल पर पादरी और ईसाई धर्म प्रचारकों के गांव में प्रवेश पर भी रोक का उल्लेख किया गया है।
ग्राम सभा ने इस निर्णय के लिए संविधान के अनुच्छेद 244(1), पांचवीं अनुसूची, पेसा अधिनियम-1996 और छत्तीसगढ़ पेसा कानून-2022 का हवाला दिया है। ग्राम सभा का कहना है कि निर्णय गांव की पारंपरिक व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान, रीति-रिवाज और सामाजिक विरासत के संरक्षण के लिए लिया गया है। जनपद सदस्य मड़कम भीमा के अनुसार ग्राम सभा ने सामाजिक एकता और सामुदायिक हित को ध्यान में रखकर फैसला किया है।
पोलमपल्ली की ग्राम सभा के निर्णय से पहले भी बस्तर में ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।
मार्च 2023 में बस्तर के रानसरगीपाल में ग्राम सभा ने बाहरी धार्मिक गतिविधियों पर नियंत्रण और मतांतरितों को गांव में शव दफनाने की अनुमति नहीं देने संबंधी प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव में ग्रामीणों ने मतांतरण के कारण आदिवासी परंपराओं, संस्कृति और पहनावे के प्रभावित होने की चिंता जताई थी।
फरवरी 2024 में बस्तर के छिंदवाड़ा में ग्राम सभा ने रूढ़ि-परंपरा छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने वालों के गांव में अंतिम संस्कार पर रोक का प्रस्ताव किया। जनवरी 2025 में इसी मुद्दे से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जब एक ईसाई परिवार को अपने पिता का अंतिम संस्कार गांव से बाहर करना पड़ा।
2025 में बस्तर और कांकेर के कुछ गांवों में पादरियों के प्रवेश पर रोक संबंधी बोर्ड लगाए जाने का मामला भी हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए संबंधित पक्षों को वैधानिक प्राधिकारी के समक्ष जाने की छूट दी थी।
जून 2026 में कांकेर के पीढ़ापाल क्षेत्र की 26 ग्राम सभाओं की संयुक्त बैठक में चर्च, प्रार्थना सभा और पादरियों के प्रवेश पर रोक का प्रस्ताव पारित होने की रिपोर्ट सामने आई।
छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के प्रांतीय अध्यक्ष राजाराम तोड़ेम कहते हैं कि जनजातीय समाज में धर्म और संस्कृति को अलग-अलग खांचों में नहीं देखा जाता। पारंपरिक पूजा-पद्धति, देवी-देवता, पर्व-त्योहार, विवाह और अंतिम संस्कार से लेकर गांव की सामाजिक व्यवस्था तक रूढ़ि-परंपरा से जुड़ी होती है। ग्रामीणों की चिंता है कि मतांतरण के साथ यदि पारंपरिक पूजा-पद्धति और रीति-रिवाजों से दूरी बढ़ती है तो आने वाली पीढ़ियों में उनकी सांस्कृतिक पहचान कमजोर हो सकती है। इसी आशंका के कारण अलग-अलग गांवों में ग्राम सभाएं अब अपनी परंपराओं और सामुदायिक संसाधनों को लेकर फैसले ले रही हैं।
पोलमपल्ली का निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा ग्राम सभाओं को परंपरा, रीति-रिवाज और सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका देता है। हालांकि, पेसा की शक्तियों की सीमा और किसी व्यक्ति के धार्मिक आधार पर प्रवेश या सामुदायिक संसाधन के इस्तेमाल पर रोक लगाने की वैधानिकता अलग कानूनी प्रश्न है। बस्तर में मतांतरण को लेकर लगातार सामने आ रहे ये प्रस्ताव बताते हैं कि यह मुद्दा अब केवल धार्मिक गतिविधियों का नहीं रहा। जनजातीय समाज के एक हिस्से में अपनी सांस्कृतिक पहचान, रूढ़ि-परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ रही है और ग्राम सभाएं उसी चिंता को प्रस्तावों के जरिए सामने रख रही हैं।