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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 10, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

'मुझे बचा लो...', जब एक हीरो के आखिरी शब्दों ने जवानों को खामोश कर दिया

कोंटा के पास माओवादियों के बारूदी विस्फोट में एएसपी आकाश राव गिरपुंजे गंभीर रूप से घायल हो गए। अंतिम समय में उनके भावुक शब्द और जवानों की बेबसी दिल दह...और पढ़ें

By Anurag MishraEdited By: Anurag Mishra
Publish Date: Tue, 10 Jun 2025 08:05:47 PM (IST)Updated Date: Tue, 10 Jun 2025 08:16:05 PM (IST)
'मुझे बचा लो...', जब एक हीरो के आखिरी शब्दों ने जवानों को खामोश कर दिया
एएसपी आकाश नक्सली हमले में शहीद हो गए थे। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. जवानों की आंखों देखा बयान
  2. अंतिम शब्दों ने भावुक किया
  3. नेतृत्व और इंसानियत की मिसाल

साई वामसी, नईदुनिया, कोंटा। Maoist attack: कोंटा के पास क्रशर प्लांट में माओवादियों के बारूदी विस्फोट के बाद की हवा में बारूद की गंध और दिलों में एक अनजाना डर था। धमाके की गूंज अभी कानों में थी, लेकिन उससे भी तेज हमारे दिलों की धड़कनें थीं।

हम भागे... उस ओर, जहां हमारे 'भाई साहब', हमारे एएसपी आकाश राव गिरपुंजे सर जमीन पर पड़े थे। जब हम वहां पहुंचे तो जो देखा, उसने हमें भीतर तक सुन्न कर दिया। चारों तरफ धुआं, दहशत और बीच में खून से लथपथ हमारे वो अफसर, जो हर मोर्चे पर चट्टान की तरह हमारे आगे खड़े रहते थे।


यह कहना था एएसपी आकाश के साथ अभियान में मौजूद जवान का। अपना नाम ना बताने की शर्त पर उन्होंने इस घटनाक्रम का प्रत्यक्ष अनुभव हमें बताया।

उनके आखिरी शब्द चुभते हैं...

  • वे कहते हैं कि अब भी उनके आखिरी शब्द कानों में गूंजते हैं। जख्मी हालत में भी उनकी आवाज में एक छटपटाहट थी, एक आखिरी कोशिश थी। उन्होंने जोर से कहा-‘मुझे बचा लो... एसपी सर को बताओ... मेरा ब्लड ग्रुप बताओ... जल्दी अस्पताल ले चलो।’
  • ये शब्द सुनकर हम स्तब्ध रह गए। जो इंसान हमें हमेशा बचाने की बात करता था, आज वो खुद को बचाने की गुहार लगा रहा था। हमारे हाथ कांप रहे थे, शब्द गले में ही अटक गए थे। हम सबने मिलकर उन्हें उठाया, लेकिन मन में एक ही ख्याल था- हम सिर्फ एक अफसर को नहीं, बल्कि एक पिता जैसे साये को खो ना दें।

  • वो हमारे लिए कभी 'सर' नहीं रहे। वो 'भाई साहब' थे, जो घायल जवान को खुद स्ट्रेचर पर उठाते थे, जो सबसे मुश्किल ऑपरेशन में सबसे आगे चलते थे। उन्होंने हमें सिर्फ लड़ना नहीं, बल्कि लोगों का दिल जीतना भी सिखाया। जब उनके बलिदान पर पूरा कोंटा शहर रोया, बाजार बंद हो गए और हजारों लोगों ने मोमबत्तियां जलाईं, तब हमें एहसास हुआ कि हमने क्या खोया है।
  • आज भी धमाके का वो मंजर हमारी आंखों के सामने घूमता है। भाई साहब का वो चेहरा, उनके वो आखिरी शब्द और हमारी वो बेबसी... सब कुछ एक नासूर की तरह चुभता है। अब हमारे मन में गुस्सा है, दर्द है और एक ही सवाल है, जो हमें सोने नहीं देता- हम इस बलिदान का जवाब कैसे दें? अपने उस नेतृत्व को सच्ची श्रद्धांजलि कैसे दें, जिसने हमें कर्तव्य और इंसानियत का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया।