
नईदुनिया प्रतिनिधि,अंबिकापुर। सरगुजा वनवृत्त में इन दिनों लगभग 121 हाथी अलग-अलग दलों में बंटकर विचरण कर रहे हैं। धान की फसल पकने के साथ ही हाथी जंगल छोड़कर आबादी और खेतों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे किसानों की मेहनत पर पानी फिर रहा है और जान पर बन आई है।खेतों में लगी धान की फसल हाथियों की सबसे पसंदीदा है। इस कारण हाथी शाम होते ही आबादी क्षेत्र से लगे खेतों में प्रवेश कर रहे हैं। बीच-बीच में दिन के समय भी मुख्य मार्ग और गांव की अंदरूनी सड़कों पर हाथियों का दल आ जाने से आवागमन पूरी तरह बाधित हो रहा है और लोगों में भय का माहौल है।
लगातार फसल चौपट होने से किसान अब टूट चुके हैं। वनवृत्त के अलग-अलग क्षेत्रों से आ रही तस्वीरें और वीडियो बेहद चिंताजनक हैं। हाथियों को खदेड़ने के लिए ग्रामीण जान की परवाह नहीं कर रहे हैं। कहीं रात के अंधेरे में सिर्फ लाठी और मशाल के सहारे हाथियों को दौड़ाया जा रहा है, तो कहीं दिन के उजाले में युवा गुलेल और पत्थर से हाथियों पर वार कर रहे हैं।
यह सीधा टकराव किसी बड़ी जनहानि को न्योता दे रहा है।वन विभाग का मैदानी अमला हाथियों की निगरानी और मुनादी का दावा कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। अपनी आंखों के सामने साल भर की फसल को हाथियों द्वारा रौंदता देख किसान खुद को रोक नहीं पा रहे हैं।
यह सीजन इंसान और हाथियों के लिए ज्यादा खतरनाक होता है। फसल बचाने की जद्दोजहद में किसान कई बार खतरनाक रास्ता अपना लेते हैं। खेत के चारों ओर करंट प्रवाहित तार लगा दिया जाता है। इसका खामियाजा हाथियों को भुगतना पड़ता है। पिछले दिनों उदयपुर वन परिक्षेत्र में खेत के चारों ओर लगाए गए करंट की चपेट में आने से एक हाथी शावक की दर्दनाक मौत हो गई थी। ऐसी घटनाएं वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत गंभीर अपराध भी है। जंगल से लगे खेतों के आसपास अचानक हाथियों के आ जाने से इंसानों का भी खतरा बढ़ जाता है।
उदयपुर क्षेत्र में हाथियों का लगातार विचरण जारी है। हाथी मुख्य मार्ग के अलावा गांव की अंदरूनी सड़कों के किनारे डेरा डाले हुए हैं। दो दिन पहले ही अंबिकापुर-बनारस राजमार्ग पर बंशीपुर के पास हाथियों का दल आ जाने से दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लग गई थी। वहीं अंबिकापुर से कल्याणपुर होते प्रतापपुर जाने वाले मार्ग पर भी अक्सर हाथियों की मौजूदगी के कारण घंटों आवागमन रोकना पड़ता है।
हाथियों को लेकर एक बात तय है कि यदि जंगल में ही चारा और पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो जाए तो हाथी बाहर नहीं निकलते। इसका सबसे अच्छा उदाहरण तमोर पिंगला है। वहां हाथियों के लिए पर्याप्त चारा, बांस और प्राकृतिक जल स्रोतों को व्यवस्थित किया गया है, इसलिए हाथी साल भर उसी इलाके में रहते हैं और बाहर नहीं आते। लेकिन सरगुजा, सूरजपुर और जशपुर के जंगलों में ऐसी कोई दीर्घकालिक योजना नहीं है। वन विभाग केवल हाथियों को एक जंगल से दूसरे जंगल में खदेड़ने तक ही सीमित है, जबकि जरूरत जंगल को ही हाथियों के अनुकूल बनाने की है।
सूरजपुर वनमंडल - 28
सरगुजा वनमंडल - 16
जशपुर वनमंडल - 34
बलरामपुर वनमंडल - 04
गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व -16
एलीफेंट रिजर्व सरगुजा - 23