
नई दिल्ली। भूख से राजधानी में तीन मासूम बच्चियों ने दम तोड़ दिया। उनके पिता मंगल सिंह और मां बीना बीते शनिवार को ही इस 7 बाई 7 के कमरे वाले नए मकान में आए थे क्योंकि बारिश के कारण उनकी झोपड़ी टूट गई थी। बच्चियों की मौत के तीन दिनों बाद भी रिक्शा चलाने वाले उनके पिता मंगल के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
मानसिक तौर पर कमजोर उनकी मां को यह नहीं पता है कि उनके बच्चे भूखे कैसे मर गए और उनका पति कहां है। परिवार बेहद अंधेरी, बदबूदार गलियों में तीन महीने तक रहा था। वहां भी पड़ोसियों के बचे-खुचे खाने से किसी तरह जिंदगी खींच रहे थे, लेकिन नए घर की 'कैद' ने बच्चियों की जिंदगी छीन ली।
कमरे में बस लोहे का एक दरवाजा है। एक खिड़की तक नहीं है। गली के दोनों तरफ रहने वाले तमाम लोग इस पूरे परिवार से और उनकी गरीबी के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। भूख की वजह से पारुल (2 साल), मानसी (4 साल) और शिखा (8 साल) ने दम तोड़ दिया।
इमारत में कम से कम 10-12 ऐसे कमरे हैं और लगभग 40 लोग यहां रहते हैं। इनमें से अधिकांश मजदूर, रिक्शा खींचने वाले या झोपड़पट्टी वाले लोग हैं। बीना का परिवार बहुत गरीब था। उसके कमरे के सामने रहने वाली मनोराम ने कहा हमने उन्हें पिछले तीन दिनों में नहीं देखा। बच्चे कमरे से बाहर नहीं आते थे और बीना भी कम ही बात करती थी।
वहीं, रहने वाली एक अन्य महिला रजनी ने कहा कि बीना को सेंस नहीं था कि वह क्या कर रही है। जब पुलिस उसे गुरुवार को ले जा रही थी, तो वह अपने कपड़ों में ही मल कर रही थी। वह अपनी बेटियों की अच्छी तरह से देखभाल नहीं कर पा रही थी। शनिवार से हमने उसके पति को भी नहीं देखा।
एक अन्य पड़ोसी कुमार ने बताया कि एक रिक्शा चलाने वाला दिन में 300 से अधिक रुपए से ज्यादा नहीं कमाता है। इसमें से 150-200 रुपए तो रिक्शे का किराया ही निकल जाता है।