
महाराष्ट्र-हरियाणा के चुनावों ने लोकसभा के जनादेश को पुख्ता करते हुए भारतीय राजनीति में कांग्रेस की जगह पर भाजपा को बैठा दिया है। ऐसी हालत में अब भाजपा बनाम गैर-भाजपा को भारत की भावी राजनीति की धुरी माना जा सकता है। झारखंड, जम्मू-कश्मीर और बिहार के चुनावों में इस धुरी की अहमियत रहेगी। बिहार में गैर-भाजपा गठबंधन पहले ही बन चुका है, जिसने अगस्त के विधानसभा उपचुनावों में 10 में से छह सीटें हासिल करके मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने की कोशिश की है। फिलहाल गैर-भाजपाई गठबंधन की यह राजनीति बहुत अलसाए और अनमने तरीके से ही आगे बढ़ेगी।
हम 1996-98 की ऐसी ही गैर-भाजपाई सरकारों का इतिहास भुला सकते हैं, लेकिन बिहार की भाजपा-विरोधी गठबंधन राजनीति की ताजा तस्वीर भी उसी प्रकार से निराशाजनक है। केवल भाजपा-विरोध के नाम पर पार्टियों को एकजुट करना मेंढकों को तौलने जैसा है। अनुमान है कि यह गठजोड़ सिर्फ सियासी जोड़तोड़ तक सीमित रहेगा। इसके बावजूद आने वाले समय में भाजपा-विरोधी मंच को असरदार मोर्चा बनाने की कोशिशें जारी रहेंगी। भाजपा सरकारों की असफलता की स्थिति में इस राजनीति को मौका मिल सकता है।
भाजपा-विरोधी राजनीति में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां स्थायी तौर पर शामिल रही हैं। इस पुरानी कहानी में क्षेत्रीय दलों के आने से नाटकीय मोड़ आ सकता है। भारतीय राजनीति में पहली बार भाजपा कई नए क्षेत्रों में मुख्य विरोधी दल की हैसियत में आने लगी है। विशेष तौर पर देश के पूर्वी तटीय प्रदेशों के सत्ताधारी क्षत्रपों को अब कांग्रेस की जगह पर भाजपा का सामना करना पड़ रहा है। ममता बनर्जी और नवीन पटनायक को अब भाजपा-विरोधी मोर्चे की जरूरत पड़ सकती है। उत्तर प्रदेश और बिहार के सरकारी दलों की भी यही स्थिति है। चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी, फारूख अब्दुल्ला, अजित सिंह, देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली मंझोली और छोटी पार्टियों पर भाजपा-विरोधी राजनीति करने का ऐसा दबाव नहीं है, लेकिन वे राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने और सत्ता में समायोजन के लिए इस राजनीति का प्रयोग कर सकते हैं। लोकसभा चुनाव के पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने ऐसा मोर्चा बनाने का प्रयास किया था। भाजपा-विरोधी मोर्चा बनाने के नए अभियान की कमान शरद यादव के हाथ में है। अपने साम्यवादी साथियों की तरह वे भी जमीनी राजनीति से बेदखल हो चुके हैं और अब इसी तरह की राजनीति से अपनी अहमियत बनाए रखना चाहते हैं।
गैर-भाजपावादी वर्ग की कुछ बातों को हमारे राजनीतिक विमर्श में जगह मिल चुकी है। गैर-भाजपावादी प्रचार में भाजपा को संघवाद और सांप्रदायिक सद्भाव का विरोधी बताया जा रहा है। यह आरोप है कि मोदी की वर्चस्ववादी राजनीति ने यहां तक कि शिवसेना और अकाली जैसे एनडीए के पुराने सहयोगियों को भी परेशान कर दिया है। यह तर्क नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, मुलायम और नीतीश जैसे क्षेत्रीय नेताओं को बहुत प्रिय लगता है। इन क्षेत्रीय शक्तियों को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस लोकसभा में कुछ क्षेत्रीय दलों का असाधारण असर रहा है। केवल जयललिता, ममता और नवीन पटनायक की क्षेत्रीय सत्तारूढ़ पार्टियों ने ही लोकसभा में 90 से ज्यादा सीटें हासिल की हैं। केसीआर और जगन रेड्डी ने भी अपनी लोकप्रियता साबित की है। इन सभी क्षेत्रीय नेताओं को गैर-भाजपावाद उपयोगी लग सकता है। उनकी इस रणनीति में मोदी सरकार को संघवाद-विरोधी प्रभुत्ववादी प्रवृत्ति का दोषी ठहराना भी उतना ही उपयोगी है।
गैर-भाजपावादी राजनीति को इन क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव ने सशक्त किया है, जबकि कांग्रेस की कमजोरी ने भी ठीक वही काम किया है। इसके पीछे के तर्क को समझना होगा। कांग्रेस पहले भी चरण सिंह, चंद्रशेखर और गुजराल की सरकारों को समर्थन देकर गिरा चुकी है। अब कांग्रेस किसी भी गैर-भाजपाई गठबंधन के साथ ऐसा खिलवाड़ करने की हैसियत में ही नहीं है। भाजपा-विरोधी मोर्चा बनाकर ही वह अब अपनी सीमित शक्ति को सुरक्षित रख सकती है। कुल मिलाकर कई बड़े क्षेत्रीय दलों, साम्यवादियों और कांग्रेस को भाजपा-विरोधी राजनीति के लिए अच्छे अवसर की तलाश है। यह हो सकता है कि कच्चे तेल, धातुओं और खनिजों के दामों में भारी गिरावट का वर्तमान दौर पलट जाए, जिसके बाद केंद्र सरकार के लिए आर्थिक समस्याओं का समाधान करना कठिन हो जाए। ऐसी कई परिस्थितियों में गैर-भाजपावाद को बढ़त मिल सकती है।
आम लोगों में अभी कुछ समय तक नई सरकार को मौका देने की भावना दिखती है। कुछ समय बाद जरूर भाजपा-विरोधी मोर्चे की रफ्तार बढ़ सकती है, लेकिन इसके रास्ते में बड़ी बाधाएं भी हैं। उसकी एक समस्या यह है कि भारतीय राजनीति में वाम मोर्चा लुप्त होता जा रहा है। वास्तव में अभी तक के सभी भाजपा-विरोधी अभियानों को साम्यवादियों ने सर्वाधिक सशक्त समर्थन दिया है और प्राय: उन्होंने ऐसा करने के लिए सत्ता की कोई सौदेबाजी भी नहीं की है। 1996 और 2004 की सरकारों को साम्यवादी दलों के क्रमश: 44 और 52 लोकसभा सदस्यों की वजह से शक्ति मिली थी। इसके बाद दोनों दल गिरकर 20 पर पहुंचे और अब 10 पर आ गए हैं। साम्यवादियों की इस निर्बलता ने भाजपा-विरोधी राजनीति को कमजोर किया है।
इसके अलावा गैर-भाजपा राजनीति में एक समस्या यह है कि अब कई प्रदेशों में दो परस्पर विरोधी क्षेत्रीय दलों का असर बढ़ गया है। गैर-भाजपावाद को द्रमुक-अन्नाद्रमुक के बीच, पीडीपी-नेशनल काफ्रेंस के बीच, तृणमूल-वाम मोर्चा के बीच और सपा-बसपा के बीच एक को चुनना और दूसरे को छोड़ना पड़ सकता है। इस तरह छोड़ा गया दल भाजपा के पास आ सकता है। एक को चुनने और दूसरे को छोड़ने का आधार भी कोई भाजपा-विरोधी विचार नहीं होगा, बल्कि सिर्फ जोड़-तोड़ होगा। वास्तव में गैर-भाजपावाद को भाजपा की लोकप्रियता से कम और अपने भ्रष्टाचार से अधिक खतरा है।
- लेखक राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।