दुनिया के दिग्गज देशों की विदेश नीति के विषय में यह बात एकदम सही है कि उनकी इस नीति में सरकारों के बदलने के साथ बहुत बदलाव देखने को नहीं मिलते। हालांकि भारत में यह रुझान कुछ बदला है। यहां 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से विदेश नीति में एक नया उभार देखने का मिला है। हालांकि वैश्विक शक्ति अनुक्रम में ऊपर बढ़ते किसी देश के लिए ऐसा बदलाव बहुत स्वाभाविक भी है। भारतीय विदेश नीति में आए इस बदलाव के तत्व को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने करीब एक साल पहले अपने एक भाषण में व्यक्त करने के साथ ही हल में अपनी किताब में भी रेखांकित किया है। जयशंकर का कहना है कि अब कहीं अधिक आत्मविश्वास से ओतप्रोत भारत एक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। इसमें उन्होंने यह दलील भी दी कि ऐसा देश जो एक दिन दुनिया की बड़ी शक्ति बनने की हसरत रखता हो, वह विवादित सीमाओं, विखंडित क्षेत्र और अवसरों को पर्याप्त रूप से न भुना पाने की स्थिति को कायम नहीं रख सकता।

कुल मिलाकर बदलते वैश्विक परिदृश्य में हम ठहरे हुए नहीं रह सकते। जयशंकर का यह भाषण अब एक केंद्रीय बिंदु बन गया है। सामरिक विश्लेषकों की एक बिरादरी जो भारतीय विदेश नीति में निरंतरता एवं उसकी उपयोगिता का बखान करते नहीं थकती, उसे जयशंकर का भाषण आईना दिखाने का काम करता है। वह दो-टूक लहजे में कहते हैं कि विगत सात दशकों में भारतीय विदेश नीति का बहीखाता मिली-जुली तस्वीर ही दिखाता है। वह यह भी रेखांकित करते हैं कि विदेश नीति में निरंतरता अतिरेक भी हो सकती है।

वर्ष 2019 में और भारी बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में आए प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अपने महत्वाकांक्षी एजेंडे का तुरंत आगाज किया। विदेश मंत्री के रूप में किसी कद्दावर नेता के बजाय उन्होंने पूर्व राजनयिक एस जयशंकर लाकर तमाम लोगों को चौंका दिया। जयशंकर की नियुक्ति ने यह दर्शाया कि वैश्विक स्तर पर उथलपुथल को लेकर मोदी खासे संजीदा हैं और इस हलचल में नैया पार लगाने के लिए उन्हेंं किसी अनुभवी दिग्गज की दरकार है। जयशंकर न केवल मोदी की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हैं, बल्कि उन्हेंं परंपराओं के बजाय पेशेवर रुख भी प्रदान करते हैं। मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के मसले पर लिए गए फैसले से उपजी परिस्थितियों में वैश्विक मोर्चे पर जयशंकर की इन क्षमताओं की आवश्यकता और अधिक महसूस हुई। तब भारत ने पूरी दुनिया और खासतौर से दिग्गज देशों को साधने का काम किया। वैश्विक स्तर पर अपने कद को बढ़ाने और हितों की पूॢत के लिए नई दिल्ली ने अंतरराष्ट्रीय तंत्र में प्रभावी तमाम पक्षों के साथ विभिन्न मोर्चों पर सक्रियता भी बढ़ाई है। यह कसौटी दक्षिण एशिया में भारत के पड़ोसियों से लेकर हिंद महासागर क्षेत्र और पश्चिम एशियाई देशों तक पर लागू होती है। जब यूरोपीय संघ अपनी भू-राजनीतिक पैठ को बढ़ाने में जुटा है, तब यूरोपीय देशों के साथ भी भारत के रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्री के साथ भारतीय विदेश और रक्षा मंत्री की बातचीत से भी यही साबित होता है।

भारत का बढ़ता कद बदलते वैश्विक ढांचे में अपने प्रमुख साझेदारों के साथ नई दिल्ली के रवैये को नए सिरे से तय कर रहा है। जहां भारत में कुछ वर्ग अभी भी गुटनिरपेक्षता के हिमायती बने हुए हुए हैं, वहीं मोदी के नेतृत्व में नई दिल्ली गुटनिरपेक्षता से इतर अलग रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में आगे बढ़ रही है। भारतीय विदेश नीति में इस रुख की लंबे अर्से से प्रतीक्षा की जा रही थी और साझेदारी से कन्नी काटने के बजाय उनसे लाभ उठाने की दिशा में आगे बढऩा देश के हित में है। यही कारण है कि आज भारत वैचारिक बैसाखियों से मुक्त होकर अपनी द्विपक्षीय साझेदारियों को अपने हिसाब से परिभाषित करने की बेहतर स्थिति में है।

भारत की विदेश नीति के उद्भव में चीन का उभार एक निर्णायक पहलू है। इन दिनों चीन के उभार और उससे जुड़े तमाम पहलुओं पर व्यापक चर्चा हो रही है। इससे इन्कार नहीं कि चीन अंतरराष्ट्रीय ढांचे को प्रभावित कर रहा है। वह हर मोर्चे पर सक्रिय है और वैश्विक ढांचे को चुनौती दे रहा है। वह खुद को नए वैश्विक आॢथक ढांचे के संरक्षक के तौर पर पेश करने का भी प्रयास करता है। सबसे अधिक आबादी और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में चीन वैश्विक ढांचे में और प्रभावशाली भूमिका निभाने के लिए तत्पर दिखाई देता है। 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी के बाद से अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी भूमिका को लेकर चीनी नेतृत्व और मुखर हुआ है। फिर भी चीन में तमाम चुनौतियां कायम हैं। उसकी प्रति व्यक्ति आय अभी भी विकसित देशों के मुकाबले खासी कम है। साथ ही बढ़ती विषमता और बूढ़ी होती आबादी भी उसके लिए समस्याएं बनी हुई हैं। चीन के लिए आॢथक समृद्धि की निरंतरता बेहद आवश्यक है।

शी चिनफिंग से पहले चीनी नेता चीन की गरीब या विकासशील देश के रूप में चर्चा कर लिया करते थे, लेकिन शी चीन को महाशक्ति मानते हैं। शी वास्तव में माओत्से तुंग के बाद चीन के सबसे शक्तिशाली नेता बन गए हैं। चीनी संविधान ने उनके आजीवन सर्वोच्च नेता बने रहने का रास्ता भी साफ कर दिया है। चीन भले ही बहुध्रुवीय विश्व की बात करता हो, लेकिन वह एशिया में एकछत्र धाक चाहता है। हाल के वर्षों में सामुद्रिक दावे और धौंस के जरिये उसने यही साबित करने की कोशिश की है कि इस क्षेत्र और उससे परे उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं। चीनी युद्धोन्माद का तोड़ निकालने में क्षेत्रीय शक्तियां बहुत कमजोर हैं। चीन के सामने आसियान कागजी शेर ही साबित होता है। चीन की बांटो और राज करो की नीति ने दक्षिणपूर्व एशिया में किसी कारगर एकता को खंडित करने का ही काम किया है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में, जहां चीन और भारत, दोनों उभर रहे हैं, अतीत की तुलना में दोनों देशों के बीच टकराव के मामले भी बढ़े हैं। हिमालयी क्षेत्र में दोनों देशों के बीच तल्खी इसी रुझान की पुष्टि करने के साथ ही इस क्षेत्र में नई भू-राजनीतिक वास्तविकता को दर्शाती है। इसका सार यही है कि भविष्य में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए संघर्ष की धार और तेज होगी।

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं।)

Posted By: Arvind Dubey

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