एक और सियासी महानायक हमारे बीच नहीं रहा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के जरिए काल के कपाल पर ऐसी अमिट छाप छोड़ी है, जो कभी धुंधली नहीं होगी। वे एक अलग ही किस्म के राजनेता थे और इसी वजह से वे करोड़ों लोगों के दिल में ताजे फूल की सुंगध की तरह हमेशा बसे रहेंगे। वर्ष 1962 में चीन द्वारा किए गए छल के बाद संसद में चर्चा के दौरान उन्होंने जो अद्भुत वक्तव्य दिया था, वह हम जैसे उस दौर में रहे लोगों के जेहन में अब भी ताजा है। उनकी बातों को सुन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनके वक्तृत्व कौशल के कायल हुए बगैर नहीं रह सके थे। उनकी लोकप्रियता व जनस्वीकार्यता इस कदर थी कि वे तब जनसंघ के नेतृत्व के रुख को चुनौती देने से भी नहीं हिचकिचाए। मुझे याद आता है कि उस दौर में दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ को कांग्रेस के विरोधियों की भीड़ से अलग रखना चाहते थे। वे राजनीति में शुचिता बरकरार रखने के पक्षधर थे।
लेकिन अटलजी ने दमदार तरीके से अपने विचार रखते हुए कहा कि उनकी पार्टी दूसरों से अलग रहना वहन नहीं कर सकती। जब तक सभी शक्तियां एकजुट नहीं होंगी, तब तक कांग्रेस-विरोधी वोट बंटते हुए कांग्रेस की जीत तय करता रहेगा। इस तरह उन्होंने भारत में पहली बार गठबंधन राजनीति के विचार को आगे बढ़ाया ताकि चौथे आम चुनाव में कांग्रेस के समक्ष सफल चुनौती पेश की जा सके। वह इसके मुख्य रणनीतिकार थे, जिसने कांग्रेस के दुर्ग में सेंध लगा दी और उसे पांच राज्यों में सत्ता गंवानी पड़ी और इसका बहुमत काफी हद तक सिमटकर रह गया। आखिरकार वर्ष 1969 तक आठ राज्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नियंत्रण से बाहर हो चुके थे। अटलजी एक नए लेजेंट के तौर पर उभरे, हालांकि दूसरे लोगों की निजी महत्वाकांक्षाओं की वजह से उनका यह प्रयोग नाकाम हो गया।
उन्होंने वर्ष 1971 में अपने अपनी शक्ति को दोबारा एकजुट किया, लेकिन तब इंदिरा गांधी अपने अजेय मंत्र के जरिए प्रचंड जनादेश हासिल करने में कामयाब रहीं। उस हार की वजह से विपक्ष के ज्यादातर नेता हताश हो गए, लेकिन अटलजी ने अपना विश्वास व धैर्य नहीं खोया। वे जनवरी 1977 में पार्टी नेताओं को यह समझाने में कामयाब रहे कि पार्टी राजनीति के मुख्य फ्रेमवर्क से बाहर रहकर गुजारा नहीं कर सकती।
वर्ष 1977 की जीत में तो उनका योगदान जबर्दस्त था ही, मोरारजी देसाई सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर भी उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। तब उन्होंने बतौर विदेश मंत्री न सिर्फ पाकिस्तान के लोगों, बल्कि बाकी दुनिया को भी यह समझाया कि भारत पाकिस्तान से वाकई बेहतर संबंध बनाना चाहता है। पाकिस्तान के दौरे से लौटने के बाद मुंबई के भिंडी बाजार के मुस्लिमों ने उन्हें अपने कंधों पर उठाते हुए एक तरह से नए लीडर की आमद की मुनादी कर दी थी।
अटलजी को एहसास था कि कुछ खास वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती। वर्ष 1980 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए सेकुलर चरित्र अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने अपने इस विचार को इस तरह आगे बढ़ाया कि पूर्ववर्ती जनसंघ का एजेंडा नवगठित पार्टी के एजेंडे में पीछे रह गया, लेकिन वर्ष 1984 के चुनाव में उनकी पार्टी महज दो सीटों पर सिमट गई तो वाजपेयी यह स्वीकार करने वाले पहले नेता थे कि 'हमने पार्टी में सिर तो सजा दिया, लेकिन पैर गायब रह गए। दूसरे शब्दों में, उन्होंने यह माना कि उनकी पार्टी अपना कैडर खड़ा करने में नाकाम रही, जो चुनाव में पार्टी की मशीनरी के तौर पर काम करता है। उनकी बात में यह भाव भी निहित था कि पार्टी सिर्फ नेताओं से खड़ी नहीं होती।
वाजपेयी अपने सिद्धांतों पर अटल रहने वाले राजनेता रहे, लेकिन इसके साथ-साथ वे एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ भी थे। उनका स्पष्ट मानना था कि आप इतिहास से मुंह नहीं मोड़ सकते, भले ही आप इसके अध्यायों को फिर से लिखें। देश में 14 फीसदी मुस्लिम आबादी एक हकीकत है, जिससे न तो पल्ला झाड़ा जा सकता है और न ही इसके अस्तित्व से इनकार किया जा सकता है। लिहाजा उनकी कोशिश रही कि मुस्लिमों का दिल जीतते हुए उन्हें यह एहसास कराया जाए कि वे भी इस देश के सच्चे नागरिक हैं।
वे जब देश के प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान से संबंध सुधारने की खातिर न सिर्फ बस लेकर लाहौर पहुंचे, बल्कि इस तरह उन्होंने दोनों ओर के करोड़ों लोगों के दिलों को भी जीता। वे वाकई एक शांतिदूत थे और दोनों देशों के मध्य शांति कायम करना उनका सपना था।
वाजपेयीजी के मन देश की तरक्की और खुशहाली के अनेक सपने जरूर रहे, लेकिन वे नेहरू जैसे स्वप्नदर्शी नहीं थे। वाजपेयी ग्रामीण परिवेश में पले और नेहरू के उलट उन्होंने असल भारत को ज्यादा करीब से देखा, जिनका कि बचपन 'आनंद भवन के ठाठ-बाट में गुजरा था। जबकि अटलजी ने भारत के 'असल आनंद को अपने व्यक्तित्व में समाहित किया था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं)