दलाई लामा अस्वस्थ हैं।

यह लेख मैं प्रार्थनामय भाव से लिख रहा हूं, और चिंतामय भाव से भी। उनकी उम्र (83 साल) में थोड़ी सी भी बीमारी चिंता का कारण बन जाती है। इसलिए प्रार्थना कर रहा हूं- ईश्वर उनको रोग-मुक्त करे, शक्ति-युक्त करे।

और उनको, सीधे उन ही को कह रहा हूं- ऋषि! ठीक हो जाइए, हमें आपकी अभी बहुत जरूरत है। भारत को आपकी जरूरत है। इंसानियत को, हमदर्दी को, विश्व-शांति को, विश्व-बंधुत्व को आपकी बहुत जरूरत है।

हम, भारत के लोग, जानते हैं कि दलाई लामा जैसी हस्ती हमारे बीच है। लेकिन उस ज्ञान को, उस बात को, हमने अपने दिमाग और दिल के एक कोने में डाल दिया है। ठीक वैसे जैसे घरों में लोग किसी संदूक में कोई कीमती असबाब रख देते हैं, जैसे कि पुरानी रुद्राक्ष की जप-माला जो इतनी शिथिल नहीं कि स्पर्श पर टूट जाए, लेकिन इतनी मजबूत भी नहीं कि उसको लेकर हम जाप करें। या कोई पुरानी तस्वीर, कोई खत, कभी किसी जमाने में लिखा हुआ दस्तावेज जिससे आज किसी का कोई सरोकार नहीं, जो हर रोज के काम के लिए जरूरी नहीं, जिसकी हमें कद्र है, जरूरत नहीं, जो यादों की दुनिया में रहता है, फायदों की दुनिया में नहीं।

दलाई लामा को हमने संभाल के रख दिया है, एक सिरे पर।

दोनों शब्द काबिल-ए-गौर हैं- संभाल और सिरा...।

संभाला है हमने जरूर उनको। आश्रय दिया है, रहने को जगह। वे खुद कहते हैं, भारत ने उनको शरण दी है, पनाह दी है। 'शरण जो शब्द है, वह बुद्ध संस्कृति में बहुत महत्व रखता है। बुद्धं शरणम्, धम्मं शरणम्, संघं शरणम्! इसलिए जब दलाई लामा कहते हैं कि तिब्बत से भागते हुए जब वे भारत पहुंचे, तब पंडित नेहरू की सरकार ने और भारत की जनता ने उनको जो शरण दी, वह पुनर्जन्मी शरण थी। उस शरण से उनको न केवल रहने को जगह मिली, बल्कि उनके अस्तित्व को आदर मिला, उनकी पुरातन संस्कृति को, उनके इतिहास को, उनकी तिब्बती सभ्यता को मर्यादा मिली। चीन ने भले ही तिब्बत के देह को अपना बनाया, भारत ने तिब्बत की आत्मा को संभाला। यह कितने देशों के बारे में कहा जा सकता है? कितने देश हैं दुनिया में, जिन्होंने किसी एक व्यक्ति को ही नहीं, किसी एक समुदाय को नहीं, बल्कि एक पूरी सिफत को, एक तमाम तहजीब को, एक मुल्क के जज्बात को अपना बनाया? दलाई लामा यह जानते हैं, बार-बार कहते हैं। उनके अपने अंदाज में कहते हैं कि 'मेरा जन्म तिब्बत में हुआ, पर भारत में मैं पला हूं। यहां की दाल-रोटी मेरी हर नस में है..।

यह हकीकत है।

दूसरी हकीकत है- सिरा।

जगह दी है भारत ने, पनाह दी है भारत ने, पर फिर वह संदूक जो ठहरा। एक सिरे में, खाट के नीचे जहां वह नजर न आए, धूलभरे कोने में जो कि किसी के रास्ते में न आए, जिसकी जगह किसी और काम में न होए, वह सिरा। हमने धर्म अपनाया, शरण दी। फिर... सिरा-शरणम् गच्छामि। कोना-शरणम् गच्छामि। हाशिया- शरणम् गच्छामि। धर्मशाला वह कोना है। बेहद सुंदर, बेहद शांतमय। बेहद स्वास्थ्य-संपन्न्। हिमालय की गोद कोई मामूली जगह नहीं। रमणीय है, स्मरणीय है। लेकिन मेरा मतलब भौतिक सिरे से नहीं है। जब मैं कहता हूं कि दलाई लामा को हमने एक सिरे में रख डाला है, तो मेरा मतलब है दिमागी सिरे से। उनको हमने, हिंदी-नुमा अंग्रेजी में कहना हो तो, 'एडजस्ट कर दिया है। बस, बात खत्म। वे महापुरुष हैं, धर्म-पुरुष हैं, गुरु-समान, प्रणम्य। उनको आदर मिल गया है, प्रणाम मिलता है। और इससे आगे क्या करने की जरूरत है?

हाय जरूरत! क्यों और कैसी जरूरत?

यहां मैं कहे देता हूं कि मेरा उद्देश्य दलाई लामा को राजनीतिक रंगों में रंगने का नहीं है। उनके विवेक ने, उनकी बुद्धि ने, उनकी साफगोई समझ ने उनको राजनीति से दूर, सुदूर रहने को कहा है। भारत और चीन के बीच उनके कारण कोई तनाव हो, ऐसा उन्होंने कुछ न करना अपना एक बुनियादी कर्तव्य माना है और उसका पालन किया है। यह सराहनीय है। और भारत की भीतर की राजनीति में तनिक भी दखल न देने का भी उन्होंने आरंभ से अपना रवैया बनाया है। यह भी उतना ही सराहनीय है। उस निर्णय और उस तरीके में कोई फर्क नहीं आना चाहिए। और यह भी कहना ठीक होगा कि किसी राजनीतिक दल ने भी उनको राजनीति में ले आने की कोशिश नहीं की है। सब ने उनका धार्मिक महत्व पहचाना है और उसका आदर किया है।

दलाई लामा ने जो भी कुछ सार्वजनिक बयान किए हैं तो वह भाईचारे और अमन के पक्ष में किए हैं। सद्बुद्धि, करुणा, प्रेम के पक्ष में। और इतना ही नहीं, उन्होंने बुद्ध के सर्वोपरि शिष्य होते हुए भी बौद्ध धर्म का भारत के अन्य धर्मों से बड़ा या ऊंचा दिखाने का प्रयत्न नहीं किया है। इस संयम से दलाई लामा का कद बहुत ऊंचा बना है।

आज हमारे देश में कई ऊंचे कद के लोग हैं- सियासत में, उद्योग में, विज्ञान और तकनीकी में, लेखक वर्ग में, कलाकारों में। फिल्म और खेल जगत में सितारों की कमी नहीं। धार्मिक संस्थाओं में भी 'पहुंचे हुए लोग मिल जाते हैं- जैसे कि बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, सद्गुरु जग्गी, लेकिन दार्शनिक जो कहलाए जाते हैं, वैचारिक मार्गदर्शी, उनकी सख्त कमी है। अंग्रेजी में जिनको सोशल फिलॉस्फर कहते हैं, ऐसों की किल्लत है, हिंदुस्तान में।

गांधी, विनोबा, बाबासाहब आंबेडकर, जयप्रकाश सामाजिक दार्शनिक थे। उनके विचार राजनीति से जुड़े होते हुए भी, राजनीति से ऊपर थे- समाज को संबोधित करते थे। दक्षिण में ईवी रामास्वामी 'पेरियार भी ऐसे थे। उनके विचार देश के दिल से जुड़े थे, उसके अध्यात्म से। आज ढूंढने पर भी ऐसा दार्शनिक नहीं मिलता है भारत में। धर्मगुरु और महंतों में अंतर कम है। महंत मिल जाएंगे, मुनि नहीं। राजयोगी मिल जाएंगे, ऋषि नहीं।

दीया तले अंधेरा, यह हम सुन चुके हैं। दलाई लामा हमारे बीच होते हुए भी हमारे हृदय के मध्य नहीं, उसके एक सिरे पर हैं, इसलिए मैं उन्हें अंधेरे तले दीया मानता हूं। हमें उस दीये को अंधेरे से बाहर लाना है। उसके उजाले से अपना सामाजिक मार्ग ढूंढना है।

छल, कपट, लालच, ईर्ष्या, हिंसा... इनका सामना समाज में कैसे करें, इसका बोध दलाई लामा से जियादह कौन देगा? लेकिन नहीं... हम उनकी ओर देख, उनकी हिदायत नहीं मांग रहे हैं। और वे जो ठहरे संयमी, वे खुद अपना उपदेश हम पर नहीं थोपने वाले।

रही बात सरकार की। आज की वर्तमान सरकार ही नहीं, सारी सरकारें हिंदुस्तान की, दलाई लामा के विषय में संकोची रही हैं।

क्या चीन की प्रतिक्रिया से इतनी घबराई हुई हैं?

मेरी समझ में चीन से हमें इस बात में घबराना अनावश्यक है। हम तिब्बत को चीन का अभिन्न् अंग मानते हैं। मानते रहेंगे। उसकी संस्कृति का पोषण हम जरूर चाहेंगे, लेकिन उसका चीन में समावेश हम स्वीकार चुके हैं। संकट या समस्या यहां नहीं। और तो और, दलाई लामा स्वयं तिब्बत को चीन से अलग नहीं देखते हैं, वे सिर्फ तिब्बती अध्यात्म और संस्कृति की और वहां के बौद्ध परंपरा की सुरक्षा चाहते हैं।

तो फिर हमारी सरकारें दलाई लामा को भारत-रत्न से क्यों नहीं अलंकृत करना चाहतीं?

बादशाह खान अब्दुल गफ्फार खान, नेल्सन मंडेला, मदर टेरेसा को भारत-रत्न हमने नि:संकोच ही नहीं, सहर्ष प्रदान किया है। दलाई लामा की क्या गलती है कि वे इस सर्वोपरि उपाधि से वंचित हैं? इसमें उनकी क्षति नहीं, हमारी है।

वैसे बात भारत-रत्न की नहीं। बात भारत के स्वाभिमान की है।

दलाई लामा आज विश्व में गौतम बुद्ध के प्रतीक हैं। जहां भी जाते हैं, दुनिया उनमें बुद्ध का स्वरूप देखती है। केवल हम हैं जो कि उनमें तथागत का दर्शन नहीं देखते। लेकिन शायद इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जो देश गौतम बुद्ध के महत्व को ही नहीं पहचान पाया है, वह उनके प्रतीक के महत्व को कहां समझेगा?

इतना कहकर अपना अफसोस पूरा करता हूं। आज बाबासाहब आंबेडकर हमारे मध्य होते तो कहते, 'चीन से हमारा रिश्ता अपनी जगह है, हमारे अंतस से हमारा रिश्ता अपनी जगह है। दलाई लामा भारत के ही नहीं, विश्व के रत्न हैं। अंधेरे में रोशनी...।

ईश्वर उनको दुरुस्त रखे।

(लेखक पूर्व राजनयिक-राज्यपाल हैं और वर्तमान में अध्यापक हैं)