
चौदह साल पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी न्यूयॉर्क पहुंचे थे, तो उन्होंने वहां एशिया सोसायटी से कहा था कि भारत और अमेरिका 'स्वाभाविक सहयोगी" हैं। इस बात की संभावना कम ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान ऐसी कोई बात कहेंगे। भले ही वे इस बात को बार-बार दोहराते रहें कि दुनिया के इन दो महान लोकतांत्रिक देशों के बीच 'सामरिक सहभागिता" है। पर ये चौदह साल बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ावों से भरपूर रहे हैं।
आम तौर पर इसे याद नहीं रखा जाता कि देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पहली अधिकृत अमेरिका यात्रा से पहले भारत और अमेरिका के बीच सकारात्मक माहौल बनाने के खासे प्रयास किए थे। अमेरिका रवाना होने से पहले उन्होंने वामदलों की आलोचना को दरकिनार करते हुए भारत में अमेरिकी निवेश को प्रोत्साहन देने वाली नीतियां लागू की थीं। इंदिरा गांधी ने पहले 60 के दशक के अंत और फिर 80 के दशक के प्रारंभ में अमेरिका से अच्छे रिश्ते बनाने पर जोर दिया और इस बीच भारत को सोवियत संघ का सहयोगी भी बनाया। राजीव गांधी ने भी अमेरिका से रिश्ते सुधारने के लिए अतिरिक्त प्रयास किए थे। पीवी नरसिंहराव ने तो महज इसलिए परमाणु शस्त्रों के परीक्षण का निर्णय लेने के बावजूद परीक्षण नहीं किया था कि कहीं इससे अमेरिका नाराज न हो जाए। अमेरिका की तरफ से भी समय-समय पर भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया जाता रहा है। पर हर बार ऐसा होता कि भारत-अमेरिका के रिश्ते दो कदम आगे बढ़ते तो फिर उसके बाद उन्हें किन्हीं कारणों से एक कदम पीछे हटना पड़ता।
निश्चित ही, वाजपेयी द्वारा यह कहना कइयों के लिए चौंकाने वाला था कि भारत अमेरिका का 'स्वाभाविक सहयोगी" है। लेकिन मुझे लगता है कि उनके इस कथन का एक संदर्भ था। बीसवीं सदी के अंतिम दौर में अमेरिका भारत में अधिक दिलचस्पी लेने लगा था। उसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत की सफल यात्रा की थी और कारगिल युद्ध के बाद दक्षिण एशिया के संबंध में उनकी नीतियों का अमेरिका में विपक्ष द्वारा भी समर्थन किया गया था। तभी 'फॉरेन अफेयर्स" पत्रिका के जनवरी-फरवरी 2000 के अंक में रिपब्लिकन नेत्री कोंडोलीजा राइस का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'एशिया में क्षेत्रीय संतुलन के लिए अमेरिका को भारत पर अधिक ध्यान देना चाहिए। हमारी यह आदत बन चुकी है कि हम भारत को केवल पाकिस्तान और कश्मीर मसले से ही जोड़कर देखते हैं, जबकि चीन के गणित में भारत की एक जगह है, इसलिए हमारे गणित में भी उसकी जगह होनी चाहिए। भारत अभी कोई बड़ी ताकत नहीं है, लेकिन उसमें एक बड़ी ताकत बनने की संभावनाएं जरूर हैं।"
जहां भारत ने इसका तो स्वागत किया कि अमेरिका अब उसे महज पाकिस्तान के साथ जोड़कर देखने को राजी नहीं है, वहीं भारत और अमेरिका दोनों इसके लिए तैयार नहीं थे कि भारत को चीन के संदर्भ में देखने के क्या नतीजे होंगे। वाजपेयी सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया तो उन्होंने अपनी एटमी रणनीति के लिए 'चीनी चुनौती" का भी हवाला दिया था। इसी के बाद उन्होंने अमेरिका में कहा कि भारत और अमेरिका 'स्वाभाविक सहयोगी" हैं। शायद, इसी का अमेरिकी रणनीतिकारों ने यह अर्थ निकाला कि एशिया में चीन के बढ़ते दबदबे के मद्देनजर भारत अमेरिका का सहयोगी बनने को तत्पर है। लेकिन उन्होंने एक स्वतंत्र विदेश नीति अख्तियार करने की भारत की आकांक्षा को समझने की कोशिश नहीं की।
2000 के दशक के प्रारंभ में एक महाशक्ति के रूप में चीन के उदय और बीजिंग ओलिंपिक से पहले उसकी सफल एशिया डिप्लोमेसी के बाद ही शायद अमेरिका ने कोंडोलीज राइस द्वारा दी गई इन हिदायतों पर ध्यान देना शुरू कर दिया कि भारत से बातचीत बढ़ाना शुरू की जाए। यह संयोग ही था कि अमेरिका द्वारा भारत से 'बातचीत बढ़ाने" के उस दौर में ही वर्ष 2003 से 2008 तक भारत ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सराहनीय प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अप्रत्याशित दृढ़ता दिखाते हुए जिस तरह से नागरिक परमाणु सहभागिता करार को अंजाम तक पहुंचाने के लिए अपनी सरकार तक को दांव पर लगा दिया, उसने भी अमेरिका को प्रभावित किया।
यदि वर्ष 2008-09 में अटलांटिक के दोनों छोरों पर मंदी की मार नहीं पड़ती तो भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्ते और ऊंचाइयों पर जाते और उनमें एक सामरिक गहराई भी आ जाती। लेकिन मंदी ने दुनिया का नक्शा काफी हद तक बदला है। वह भी सितंबर का ही महीना था, जब 2008 में अमेरिका में लेहमैन ब्रदर्स का पतन हुआ और वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में अमेरिका की साख पर बट्टा लग गया।
जहां अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्था पस्त थीं, वहीं चीन तेजी से आगे बढ़ता गया। यदि मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के दौरान भारत भी तेजी से आगे बढ़ता तो एशिया में शक्ति-संतुलन इतने नाटकीय ढंग से नहीं गड़बड़ाता। लेकिन यूपीए-2 ने भारत को मायूस किया। भारत का विकास-रथ थमा और केंद्र में व्याप्त विभ्रम और नीतिगत पंगुपन के कारण भारत-चीन के बीच का फासला तेजी से बढ़ता चला गया। मंदी के बाद जब बराक ओबामा सरकार ने अपने वैश्विक रिश्तों के बारे में पुनर्विचार करना प्रारंभ किया तो उसने तय किया कि अब उसे चीन से अपने रिश्ते सुधारना होंगे। वह तो चीन के साथ 'जी-2" समीकरण निर्मित करने की हद तक चला गया। भारत ने भी वैश्विक शक्ति-समीकरणों को समझने की कोशिश की और अमेरिका-चीन-भारत त्रिकोण के बीच संतुलन साधने की कोशिश करने लगा।
तब से अब तक तस्वीर बहुत बदल चुकी है। मंदी के बाद का दौर 'पोस्ट-अमेरिकन वर्ल्ड" भले ही न हो, जैसी कि कुछ भविष्यवक्ताओं द्वारा घोषणा की गई थी, लेकिन इतना जरूर है कि अब यह जमाना 'जियो-पोलिटिक्स" के साथ ही 'जियो-इकोनॉमिक्स" का भी है, जिसमें शक्तियों की बहुध्रुवीयता के कारण स्वायत्तताओं की गुंजाइशों के अनेक कोण निर्मित हुए हैं। वर्ष 2012 में अपने एक लेख में मैंने कहा था कि वैश्विक आर्थिक गतिविधियों का रुख 'वेस्ट टु द रेस्ट" और खासतौर पर एशिया की दिशा में होने का कारण 2008 की मंदी से लगा झटका था। उस झटके से सबसे ज्यादा फायदा चीन ने उठाया है।
यही कारण है कि जब नरेंद्र मोदी की बराक ओबामा से मुलाकात होगी तो उसके पीछे एक व्यापक पृष्ठभूमि होगी। उनकी बातचीत में इस तथ्य से जरूर बाधा आ सकती है कि जहां नरेंद्र मोदी भारत के उभरते सितारे हैं, वहीं बराक ओबामा अमेरिका के डूबते हुए सूर्य हैं। क्या एक कमजोर अमेरिकी राष्ट्रपति आत्मविश्वास के साथ एक ऐसे महत्वाकांक्षी भारतीय प्रधानमंत्री की ओर हाथ बढ़ा सकता है, जो अगले एक दशक में भारतीय इतिहास की दशा-दिशा को बदल देना चाहता है? चीन के उदय को रोकना तो अब शायद संभव नहीं होगा, लेकिन अमेरिका को यह समझना होगा कि एक मजबूत और आत्मविश्वस्त भारत उसके हित में ही होगा। उम्मीद है कि जब मोदी ओबामा से मिलेंगे तो वे उन्हें यही संदेश देंगे।
(लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली में ऑनरेरी सीनियर फेलो हैं)