पाकिस्तान पत्रकारों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क बनता जा रहा है। यहां के पत्रकार आए दिन प्रताडऩा और दमन के शिकार बन रहे हैं। पत्रकारों को अनावश्यक रूप से गिरफ्तार करना, उनका शारीरिक और मानसिक शोषण करना आम बात हो गई है। पिछले दिनों यहां कई पत्रकारों को गायब करने और जान से मार देने की घटनाएं भी सामने आई हैं। दुख की बात है कि इस पर किसी तरह की रोक लगती दिखाई नहीं दे रही है। फ्रीडम नेटवर्क के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक साल में पाकिस्तान में 148 पत्रकारों के साथ मारपीट, अपहरण और हत्या की घटनाएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा घटनाएं पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में देखने को मिली हैं। पहले पाकिस्तान में इस तरह की घटनाएं महीने-दो महीने में होती थीं, लेकिन अब तो हर दो सप्ताह में किसी पत्रकार को प्रताडि़त करने की खबरें आ रही हैं। पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार और पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चेयरमैन अबसार आलम को इस्लामाबाद में उनके घर के पास गोली मार दी गई। इसके बाद इस्लामाबाद में ही एक और पत्रकार असद अली तूर के घर में तीन लोग जबरन घुस गए। हमलावरों ने उनके हाथ पैर बांधकर मारा-पीटा और उनसे पाक फौज जिंदाबाद के नारे लगवाए। इस घटना को अंजाम देने के बाद बदमाश बड़े आराम से चले गए। उन्होंने अपना चेहरा भी नहीं छिपाया था। ऐसा लगता है कि उन्हेंं इसका पूरा विश्वास था कि उन्हेंं कुछ नहीं होगा। जाहिर है ऐसा तभी होता है जब किसी ताकतवर आदमी का समर्थन होता है।

इमरान सरकार पत्रकारों के दमन की घटनाओं की तरफ से एक तरह आंखें मूंदे हुए है। उसके जिस भी मंत्री से भी इसके बारे में सवाल करो तो वह जांच जारी है कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है। हकीकत यह है कि आज तक कोई भी जांच अपने अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंच सकी है। इसी से हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। पाकिस्तान में जब कोई व्यक्ति सरकार की आलोचना करता है अथवा उसकी कमियां उजागर करता है तो उसे शारीरिक रूप से कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। ज्यादा से ज्यादा सोशल नेटवर्क साइट्स पर सरकार के आइटी सेल वाले उसकी खिंचाई कर चुप हो जाते हैं, लेकिन जब कोई पाकिस्तान की किसी एजेंसी जैसे कि सेना, आइएसआइ के खिलाफ कुछ कह देता है तो उसकी जान पर बन आती है। इन दिनों इसमें एक खतरनाक बात यह जुड़ गई है कि जबरन घरों में घुसकर मारा-पीटा जाने लगा है। अबसार आलम और असद अली तूर, दोनों ने ही एजेंसियों के नाम लिए थे। पाकिस्तान के एक और बड़े पत्रकार हमीद मीर के साथ भी इसी तरह की घटना हुई। उन्होंने सेना का नाम लेते हुए कहा था कि अगर आपने हमें डराना-धमकाना और हमसे मारपीट करना बंद नहीं किया तो हम भी चुप नहीं बैठेंगे। यह सही है कि आपकी तरह हमारे पास हथियार आदि नहीं है, लेकिन आपके बारे में हमारे पास ऐसी विस्फोटक खबरें हैं कि किसकी पत्नी ने किसे गोली मारी। उन्हेंं हम सार्वजनिक करेंगे। इसके अगले ही दिन उनके शो से हटा दिया गया, फिर उन्हेंं धमकी भरे फोन आने लगे। उन पर दबाव बनाया जाने लगा कि वह एक पत्र लिखें कि उनका बयान सेना के बारे में नहीं था। आखिरकार उन्हेंं माफी मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे यही पता लगा कि सेना और आइएसआइ अपनी आलोचना बर्दाश्त करने को तैयार नहीं।

आज पाकिस्तान में रहकर पत्रकारिता करना और लोगों के सामने सच लाना सिर पर कफन बांधकर चलने के समान हो गया है। यहां कब किस पत्रकार को जान से मार दिया जाए, कहा नहीं जा सकता। अब तो महिला पत्रकारों को भी धमकाने का सिलसिला शुरू हो गया है। मौजूदा हालात न तो पाकिस्तान की पत्रकारिता के लिए ठीक हैं और न ही पाकिस्तान की जनता और लोकतंत्र के लिए। अपनी बात कहने के लिए पत्रकारों को मारना-पीटना, जबरन उठा ले जाना, हत्या कर देना एक किस्म की तानाशाही ही है। सच्चाई यह है कि आज पाकिस्तान में अव्यवस्था और भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। सेना हो या सरकारी विभाग, हर ओर भ्रष्टाचार का आलम है। पाकिस्तान की जनता इसके खिलाफ आवाज भी उठा रही है। इसी को रोकने के लिए पत्रकारों के साथ यह सब किया जा रहा है। देखा जाए तो पाकिस्तान अपनी कमियों को नजरअंदाज करने के चलते ही इन दिनों तमाम मुश्किलों में फंसा हुआ है। पाकिस्तान का दुर्भाग्य यह है कि शीर्ष पर बैठे लोग अपने आसपास व्याप्त बुराइयों और कमियों को सुनना ही नहीं चाहते। जब भी कोई उन्हेंं सामने लाता है और सुधार की मांग करता है तो ताकत के बल पर उसे चुप कराने को कोशिश की जाती है। राजधानी इस्लामाबाद में इस तरह की हिंसक घटनाओं को अंजाम देने का मतलब यही नजर आता है कि अन्य शहरों के जो पत्रकार हैं, वे पहले ही डर जाएं और अपना मुंह बंद कर लें। इन्हेंं डराने के लिए ऐसे कानून भी बनाए जा रहे हैं कि अगर सेना के खिलाफ कुछ कहा तो जुर्माने के साथ जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी। जाहिर है पाकिस्तान में अभिव्यक्ति का आजादी इन दिनों घोर संकट में है।

चूंकि इमरान सरकार सेना की कठपुतली सरकार है, लिहाजा उससे किसी तरह की उम्मीद नहीं की जा सकती है। अब समय आ गया है कि पूरी दुनिया में मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी एवं लोकतंत्र के हित में काम करने वाले जितने भी संगठन हैं, वे आगे आएं और इसके खिलाफ आवाज उठाएं। भारत सहित अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भी पाकिस्तान में लोकतंत्र की आवाज को दबाने की इन कोशिशों को उजागर करना चाहिए, ताकि हिंसा का माहौल थमे।

(लेखिका इस्लामाबाद स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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