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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 15, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सद्प्रयासों से ही साकार हो सकेगी आनंद की अवधारणा - डॉ. देवकरण शर्मा

वह राज्य सचमुच में सुखी व संतुष्ट है और आनंद अनुभव करता है, जहां का राजा (राजप्रमुख) दार्शनिक होता है।

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Publish Date: Sun, 15 Jan 2017 10:46:46 PM (IST)Updated Date: Mon, 16 Jan 2017 12:30:17 AM (IST)
सद्प्रयासों से ही साकार हो सकेगी आनंद की अवधारणा - डॉ. देवकरण शर्मा

मध्यप्रदेश के दार्शनिक मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने पिछले वर्ष (01 अप्रैल 2016 को) भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में प्रदेश में मिनिस्ट्री ऑफ हैप्पीनेस (आनंद मंत्रालय) बनाने की घोषणा की थी। भारतीय चिंतन धारा को प्रश्रय देने वाली इस घोषणा के वक्त उन्होंने कहा था- 'विकास दर बढ़ने से ही सब कुछ नहीं होता। अब मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक रूप से भी लोगों को आनंद पहुंचाने एवं खुशी देने का काम करेंगे। इस हेतु मप्र में हैप्पीनेस मंत्रालय या आनंद विभाग बनाया जाएगा। जो योग, ध्यान, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के साथ देश-दुनिया में खुश रहने के लिए विश्व में जो कुछ भी उत्तम हो रहा है, उसे मप्र में भी लागू करवाएंगे"।


जनता को वास्तविक आनंद देने का संकल्प लेना और राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद इसे लागू करना सचमुच श्रेष्ठ राजनेता का सही दिशा में बढ़ाया गया सही कदम है। दुख, अशांति व संकटों से भरे वर्तमान समय में इसकी अत्यंत आवश्यकता है। समस्याओं का सकारात्मक व सौम्य समाधान इस अवधारणा के गर्भ में सन्न्हित है। मप्र के मुख्यमंत्री ने जनता को नैतिक, आध्यात्मिक व आत्मिक आनंद देने की दिशा में मात्र घोषणा, संकल्पना या अवधारणा ही प्रस्तुत नहीं की बल्कि आनंद विभाग गठित कर उसका मैदानी, व्यावहारिक अनुवर्तन भी शुरू कर भोपाल में पहला आयोजन 'आनंदम" संपन्न् किया। इसमें उन्होंने जनता ही नहीं बल्कि कर्मचारी, अधिकारी, नेता व मंत्रियों को भी मनोनिग्रह, मानवीयता, संवेदनशीलता और मन के परिष्कार द्वारा समाज में सुख-संतोष बढ़ाने और स्वयं अनुभव करने के सूत्र दिए हैं।



अरस्तू ने कहा था- 'वह राज्य सचमुच में सुखी व संतुष्ट है और आनंद अनुभव करता है, जहां का राजा (राजप्रमुख) दार्शनिक होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि दार्शनिक राजप्रमुख अपनी प्रजा का सकारात्मक मनोवैज्ञानिक उत्थान करने में समर्थ होता है।" संयोग की बात है कि हमारे प्रदेश प्रमुख शिवराजसिंह में वो दार्शनिकता दिखती है। वे दर्शनशास्त्र में पारंगत (स्नातकोत्तर उत्तीर्ण) भी हैं। इसी कारण उन्होंने जनता की सुख-शांति के लिए भौतिक सुख-समृद्धि बढ़ाने में ही कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं मानी बल्कि आध्यात्मिक, आत्मिक, नैतिक, मनोमय परिष्कार को भी महत्व देकर भौतिक व नैतिक विकास को संतुलित करने का प्रयास किया। स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम में अनुकूल परिवर्तन की घोषणा कर नैतिक व आत्मिक विकास करने तथा प्रत्येक गांव-नगर में आनंद भवन बनाकर साधनों को संपन्न् से विपन्न् की ओर प्रवाहित करने के अनुपम चैनल बनाने के संकेत दिए हैं। हमें इसे सकारात्मक ढंग से लेकर जनहित में सुख-शांति व आनंद बढ़ाने में भागीदार बनना चाहिए।


(लेखक संस्कृतिविद् हैं)

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