
हिंदी को प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम बनाने और सरकारी कामकाज को हिंदी में करने का प्रदेश शासन का फैसला सर्वथा स्वागतयोग्य है। दशकों बाद ही सही, सरकार नींद से तो जागी। आदेश की भाषा से सरकार के दृढ़ निश्चय का पता चलता है। प्रतियोगी परीक्षा को हिंदी माध्यम से उत्तीर्ण करके आए हमारे अधिकारी स्वभावत: हिंदी का प्रयोग करेंगे। प्रशासन में अधिक खुलापन आएगा। निर्णय तथा उनके क्रियान्वयन लटके नहीं रहेंगे। ए-बी-सी-डी अर्थात एवॉइड, बायपास, कन्फ्यूज और डायवर्ट के सिद्धांत पर चलने वाला हमारा प्रशासन अब इन हथकंडों पर नहीं, बल्कि जनहित की भावना से चलेगा। प्रशासकों की ऊर्जा अब अंग्रेजी लिखने, बोलने के बजाय काम पर खर्च होगी। महत्व भाषा का नहीं, जनता के काम का है। घोड़े का हिनहिनाना नहीं, उसकी चाल देखी जाती है।
हकीकत यह है कि ज्यादातर सरकारी अफसर अपने मातहतों से सारी चर्चा हिंदी में करते हैं, फिर उस चर्चा का निष्कर्ष अंग्रेजी में बनाया जाता है और अंग्रेजी में आदेश निकलता है। इस प्रकार भाषागत अंतर से आदेश में भी थोड़ा-बहुत फर्क आ जाता है। फिर हमारे अधिकांश जनप्रतिनिधि खुद को अंग्रेजी में अभिव्यक्त नहीं कर पाते। मतदाताओं से उनका जुड़ाव हिंदी और कई बार उसकी बोलियों के माध्यम से होता है। ऐसे में प्रशासन से अंग्रेजी माध्यम से जुड़ना उनके लिए मुश्किल पैदा करता है। आश्चर्य नहीं कि हमारे जनप्रतिनिधि सिर्फ अंग्रेजी के कारण हीनताबोध से ग्रस्त होते रहते हों। यह हीनताबोध उन्हें आदेश की मुद्रा में नहीं रहने देता। इसलिए हिंदी में होने वाला कामकाज उन्हें उनकी उचित वरीयता प्रदान करेगा। पानी ऊपर की तरफ नहीं, स्वाभाविक रूप से नीचे की तरफ बहेगा। हमारे मंत्रियों की यह शिकायत कि अफसर हमारी सुनते नहीं, दूर हो सकेगी।
दरअसल सरकारी कार्यालयों में हिंदी-अंग्रेजी का द्वंद्व कामकाज की कमजोरी को छिपाने का साधन है। यह भ्रम है कि हमारे अफसर हिंदी के विरोध में हैं। प्रदेश के कई प्रशासनिक अधिकारी न केवल धाराप्रवाह हिंदी लिखते-बोलते हैं, बल्कि हिंदी में अत्यंत प्रतिष्ठित साहित्य-सृजन भी करते हैं। इसलिए वे भी शासन के इस आदेश का स्वागत करेंगे।
आदेश का असर व्यापक रूप से लोगों की मानसिकता पर पड़ेगा। अभी जो अंधी दौड़ स्पोकन इंग्लिश और शिक्षा संस्थाओं में अंग्रेजी माध्यम की ओर हो रही है, उस पर थोड़ा विराम लगेगा। सूचना और संवाद के माध्यमों पर भी अच्छा असर पड़ेगा। सन 2000 में इंटरनेट पर अस्सी प्रतिशत जानकारी अंग्रेजी में उपलब्ध होती थी। आज यह यह 40 प्रतिशत से भी कम है। इसमें और भी कमी आएगी।
आदेश को एक झटके से लागू किया जाना उचित है। पिछला अनुभव यही बताता है कि ढुलमुल नीति से अंग्रेजी को हटाया नहीं जा सकता। फिर भी आदेश को ठीक से लागू न करने वालों के विरुद्ध पहले साल से ही नहीं, क्रमश: साल-दर-साल सख्त किया जाता तो ज्यादा व्यावहारिक और अच्छा रहता।
(लेखक साहित्यकार हैं)