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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Dec 05, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

MP News: बेटे के लिए राजनीतिक जमीन तलाश रहे दिग्विजय को मिली निराशा, सिंधिया के गढ़ में प्रभाव नहीं छोड़ पाए जयवर्धन

ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद से दिग्विजय सिंह अपने बेटे जयवर्धन के लिए ग्वालियर-चंबल अंचल में राजनीतिक जमीन तैयार करने में हैं।

By Neeraj PandeyEdited By: Neeraj Pandey
Publish Date: Tue, 05 Dec 2023 06:57:40 PM (IST)Updated Date: Tue, 05 Dec 2023 07:40:36 PM (IST)
MP News: बेटे के लिए राजनीतिक जमीन तलाश रहे दिग्विजय को मिली निराशा, सिंधिया के गढ़ में प्रभाव नहीं छोड़ पाए जयवर्धन
Digvijay Singh

HighLights

  1. बेटे के लिए राजनीतिक जमीन तलाश रहे दिग्विजय को मिली निराशा
  2. ग्वालियर-चंबल संभाग में प्रभाव नहीं छोड़ पाए जयवर्धन
  3. 2018 के मुकाबले कांग्रेस को ग्वालियर चंबल में हुआ 10 सीटों का नुकसान

जोगेंद्र सेन, ग्वालियर। ग्वालियर- चंबल संभाग में महाराजा और राजा के बीच राजनीतिक वर्चस्व की जंग बहुत पुरानी है। महाराजा यानी सिंधिया घराना और राजा यानी दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा अपना प्रभाव समय-समय पर दिखाते रहे हैं लेकिन हर बार कांग्रेस खेमे में रहते हुए महाराजा के पाले में जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने बेटे जयवर्धन सिंह के लिए ग्वालियर-चंबल अंचल में राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुट गए थे।

इस विधानसभा चुनाव को वह जयवर्धन को एक क्षत्रप के रूप में प्रोजेक्ट करने का अच्छा मौका मान रहे थे। चुनाव परिणामों में हुई 10 सीटों के नुकसान से साफ हो गया है कि दिग्विजय सिंह को इस अंचल से निराशा ही मिली है। अंचल की 34 सीटों में से आठ सीटों को छोड़ दें तो टिकट देने में दिग्विजय सिंह की अहम भूमिका थी।


2018 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया की भूमिका

ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस को 2018 के विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया के चेहरा सामने होने का लाभ मिला था। कांग्रेस अंचल की 34 सीटों में से 26 सीटों पर कब्जा करने में कामयाब हुई थी। सरकार बनने के बाद कांग्रेस ने सिंधिया के चेहरे पर मिली सफलता को पूरी तरह से नकार दिया था। इस बार कांग्रेस को यहां 10 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। यही नहीं दिग्विजय के समर्थक नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह, केपी सिंह और लाखन सिंह चुनाव हार गए। दिग्विजय के भाई लक्ष्मण सिंह भी चुनाव हार गए।

जयवर्द्धन स्वयं बमुश्किल जीत की चौखट तक पहुंच पाए

चुनाव में जयवर्धन स्वयं बमुश्किल चुनाव जीत पाए। अन्य सीटों पर प्रभाव डालना तो दूर की बात है। बता दें कि दिग्विजय सिंह के प्रभाव वाले गुना, अशोकनगर और शिवपुरी जिलों की 12 सीटों में से भाजपा को आठ सीटों पर सफलता मिली है। अंचल में पार्टी की करारी हार के पीछे की सबसे बड़ी वजह यह रही कि पौने चार साल में पार्टी यहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा कद्दावर नेता नहीं खड़ा कर पाई, जो उनका विकल्प बन सके।

इसके अलावा सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद प्रदेश स्तर की पहली और दूसरी पंक्ति में ऐसा कोई चेहरा कांग्रेस के पास नही है, जो कि कांग्रेस में सर्वमान्य हो। बात नेता प्रतिपक्ष डा गोविंद सिंह की करें तो अब उनकी उम्र दौड़भाग कर पाने की नहीं है।

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