प्यार उम्र देखकर नहीं होता लेकिन हमउम्र होते हुए भी आपसी तालमेल और सोच में फर्क आ जाए तो रिश्ते में दरार आना तय है। कुछ ऐसी ही कहानी लेकर रिलीज़ हुई है फिल्म दे दे प्यार दे। कॉमेडी पंचेज़ से भरपूर, दिल छू लेने वाला इमोशन और वही पुरानी बात भी - प्यार किया तो डरना क्या।

अकिव अली के निर्देशन में बनी 'दे दे प्यार दे' में अजय देवगन, तब्बू और रकुल प्रीत सिंह लीड रोल में हैं और फिल्म को भूषण कुमार, लव रंजन और अंकुर गर्ग ने प्रोड्यूस किया है। कहानी, लंदन में रह रहे आशीष मेहरा (अजय ) की है जो वहां फाइनेंस कारोबार से जुड़ा है। आशीष मालदार है लेकिन कुल्लू में रह रही अपनी बीवी और दो बच्चों को छोड़ चुका है। बिना टेक्निकली डिवोर्स के। वहीं उसकी मुलाकात एक हाउस पार्टी में आयशा खुराना (रकुल) से होती है जो जॉब के साथ एक बार में काम करने वाली इंडिपेंडेंट लड़की है। दोनों के बीच प्यार होता है। ये जानते हुए भी कि आशीष की उम्र 50 और आयशा की 26 है, दोनों शादी करना चाहते हैं लेकिन उससे पहले आशीष अपनी इस गर्लफ्रेंड को अपने परिवार से मिलाने ले जाता है। यहां उसकी लड़की की शादी के लिए रिश्ता आया हुआ है। अपने लन्दन वाले प्यार को छिपाने के चक्कर में उसे झूठ का भी साथ निभाना पड़ता है। इसके बाद क्या कुछ होता है ये आप फिल्म में देख सकते हैं।

अगर एक्टिंग की बात की जाय तो रकुल प्रीत सिंह सारी महफ़िल लूट ले गई हैं। आयशा के चुलबुले, बिंदास और समझदार किरदार में रकुल ने जबरदस्त अभिनय किया है। तब्बू हमेशा से ही एक्टिंग की पॉवर हॉउस रही हैं और इस फिल्म में उनके इमोशनल सीन्स बेहतरीन रहे हैं। अजय देवगन के बारे में कहना ही क्या। पुरानी बीवी और नई गर्लफ्रेंड के बीच एक आदमी की हालत और हालात दोनों को अजय ने बखूबी निभाया है। हां , पर उन पर लगी सिंघम की मुहर उनका कभी पीछा नहीं छोड़ेगी, ये इस फिल्म के एक सीन से साबित भी हो गया है। फिल्म में अजय देवगन की बेटी के रूप में इनायत सूद ने भी अच्छी परफॉर्मेंस दी है। जिमी शेरगिल, आलोक नाथ और कुमुद मिश्रा भी अच्छे लगे हैं।

दे दे प्यार दे की जान इस फिल्म की राइटिंग में बसी है। हालांकि फिल्म फर्स्ट हॉफ में ट्रीटमेंट के तौर पर कुछ हिस्से थोड़े उबाऊ हो गए हैं लेकिन तरुण जैन और लव रंजन की राइटिंग कमाल की है। लव ने इससे पहले प्यार का पंचनामा और सोनू के टीटू की स्वीटी से इस बात का सबूत भी दिया है। अकिव अली का निर्देशन और उनकी एडिटिंग भी अच्छी रही है। वो अपनी कहानी इमोशनली जस्टिफाई करने में सफल रहे हैं। इस फिल्म को पांच में से साढ़े तीन स्टार मिलते हैं।

- मनोज खाडिलकर

Posted By: Sudeep mishra