
मनोरंजन डेस्क। साल 1990 में एक फिल्म आई, जिसके पोस्टर पर हीरो-हीरोइन के चेहरे दिखाने के बजाय उन्हें एक बड़े कोट के नीचे छिपा दिया गया। न कोई बड़ा स्टार, न चेहरे की पहचान, फिर भी इस तस्वीर ने लोगों का ध्यान खींचा। यह फिल्म थी महेश भट्ट की ‘आशिकी’, जिसने अपनी कहानी और गानों के साथ-साथ पोस्टर से भी खूब चर्चा बटोरी। लेकिन आखिर नए कलाकारों के चेहरे छिपाने का फैसला क्यों लिया गया था? इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है, जिसमें मेकर्स गुलशन कुमार की चिंता, महेश भट्ट का नया विचार और ऑडियंस की उत्सुकता, तीनों शामिल थे।
आज किसी फिल्म का पोस्टर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर उसकी चर्चा शुरू हो जाती है। पोस्टर में कौन-सा अभिनेता है, हीरोइन का लुक कैसा है और फिल्म की कहानी क्या हो सकती है, इन सब पर बातें होने लगती हैं। लेकिन 1990 के दौर में फिल्म का प्रचार करने का तरीका काफी अलग था। उस समय सिनेमाघरों के बाहर लगे पोस्टर, बड़े-बड़े होर्डिंग और फिल्मी गाने ऑडियंस तक पहुंचने के अहम माध्यम थे।
ऐसे दौर में महेश भट्ट की फिल्म ‘आशिकी’ का पोस्टर बाकी फिल्मों से अलग नजर आया। इसमें मुख्य कलाकार राहुल रॉय और अनु अग्रवाल के चेहरे साफ दिखाई नहीं दे रहे थे। दोनों एक बड़े कोट के नीचे रोमांटिक अंदाज में नजर आ रहे थे। पोस्टर में चेहरों को छिपाने का यह तरीका इतना अलग था कि आज भी फिल्म की चर्चा होने पर इसकी याद आती है।
लेकिन इस तस्वीर के पीछे सिर्फ रोमांस का अंदाज नहीं था। इसके पीछे नए कलाकारों को ऑडियंस के सामने पेश करने और फिल्म को अलग पहचान दिलाने की सोच भी जुड़ी थी।
‘आशिकी’ में राहुल रॉय और अनु अग्रवाल मुख्य भूमिकाओं में थे। उस समय दोनों नए कलाकार थे और ऑडियंस के बीच उनकी कोई बड़ी पहचान नहीं थी। ऐसे में फिल्म के मेकर्स गुलशन कुमार को इस बात की चिंता थी कि नए चेहरों वाली फिल्म ऑडियंस को कैसे आकर्षित करेगी।
गीतकार समीर ने 2025 में एक इंटरव्यू में बताया था कि गुलशन कुमार को राहुल रॉय और अनु अग्रवाल की जोड़ी को लेकर पूरी तरह भरोसा नहीं था। उन्हें लगता था कि दोनों कलाकार उस दौर के हिसाब से उतने आकर्षक नहीं हैं, जितने किसी व्यावसायिक फिल्म के हीरो-हीरोइन से उम्मीद की जाती थी।
ऐसे में महेश भट्ट ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने पोस्टर में दोनों कलाकारों के चेहरे दिखाने के बजाय उन्हें एक बड़े कोट के नीचे दिखाने का विचार अपनाया। इससे पोस्टर देखने वाले लोगों के मन में उत्सुकता पैदा हो सकती थी। हालांकि, इस फैसले के पीछे गुलशन कुमार की चिंता और पोस्टर के विचार से जुड़ी बातें अलग-अलग इंटरव्यू में सामने आई हैं।
महेश भट्ट ने भी बाद में बताया था कि राहुल रॉय उस समय बहुत कम लोगों को मालूम थे। इसलिए फिल्म की टीम ने ऐसा पोस्टर बनाने का फैसला किया, जिसमें दोनों कलाकारों के चेहरे नजर न आएं। मकसद यह था कि ऑडियंस के मन में उत्सुकता पैदा हो और वे फिल्म देखने के लिए आकर्षित हों।
2013 में एक इंटरव्यू के दौरान महेश भट्ट ने पोस्टर के विचार के बारे में बताते हुए कहा था कि इस डिजाइन पर उनकी और सिनेमैटोग्राफर प्रवीण भट्ट की बातचीत हुई थी। वे चाहते थे कि उस समय की दूसरी रोमांटिक फिल्मों से अलग कुछ ऐसा किया जाए, जो लोगों का ध्यान खींच सके।
विजुअल मार्केटिंग की नजर से देखें, तो पोस्टर का यह तरीका काफी दिलचस्प था। आम तौर पर फिल्म के पोस्टर पर कलाकारों के चेहरे दिखाकर ऑडियंस को उनकी पहचान बताई जाती है। लेकिन ‘आशिकी’ ने इसके उलट काम किया। यहां चेहरे छिपाकर ही उत्सुकता पैदा की गई।
पोस्टर देखने वाला व्यक्ति यह जानना चाहता था कि आखिर इस जोड़ी में कौन है और फिल्म में इनकी कहानी क्या होगी। यानी पोस्टर ने फिल्म की पूरी जानकारी देने के बजाय एक सवाल खड़ा कर दिया।
‘आशिकी’ के पोस्टर को समझने के लिए उस दौर के फिल्मी प्रचार को भी देखना जरूरी है। आज की तरह इंटरनेट और सोशल मीडिया नहीं थे। फिल्म के पोस्टर और गाने ही ऑडियंस तक पहुंचने के बड़े माध्यमों में शामिल थे। ऐसे में पोस्टर का अलग होना फिल्म की पहचान बनाने में मदद कर सकता था।
कोट के नीचे छिपी जोड़ी की तस्वीर में रोमांस और रहस्य दोनों का एहसास था। इसमें कलाकारों के चेहरे दिखाई नहीं दे रहे थे, लेकिन तस्वीर का अंदाज ऑडियंस को फिल्म की प्रेम कहानी की तरफ आकर्षित कर सकता था।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि फिल्म की पूरी सफलता सिर्फ इसी पोस्टर के कारण मिली। फिल्म के संगीत ने भी उसकी लोकप्रियता में बड़ी भूमिका निभाई। ‘धीरे-धीरे से’, ‘नजर के सामने’ और ‘जाने जिगर जानेमन’ जैसे गाने लोगों की जुबान पर चढ़ गए।
17 अगस्त 1990 को रिलीज हुई ‘आशिकी’ बड़ी हिट साबित हुई और राहुल रॉय तथा अनु अग्रवाल को पहचान मिली।
साल 2013 में जब ‘आशिकी 2’ रिलीज हुई, तो उसके प्रचार में भी पहली फिल्म के मशहूर पोस्टर की झलक दिखाई दी। आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर को भी एक कोट के नीचे रोमांटिक अंदाज में दिखाया गया।
इससे मूल फिल्म के पोस्टर और उसकी पहचान को नई पीढ़ी के सामने दोबारा लाने का मौका मिला। पुरानी फिल्म के पोस्टर का यह अंदाज ऑडियंस के लिए परिचित था, जबकि नई फिल्म के कलाकारों ने उसे नया रूप दिया।
यह भी दिखाता है कि फिल्म का पोस्टर केवल रिलीज से पहले प्रचार करने का साधन नहीं होता। कभी-कभी वह फिल्म की पहचान का स्थायी हिस्सा बन जाता है और कई साल बाद भी ऑडियंस को उसकी याद दिलाता है।
‘आशिकी’ के पोस्टर की कहानी इस बात का उदाहरण है कि फिल्म के प्रचार में एक अलग विचार कितनी अहम भूमिका निभा सकता है। उस समय राहुल रॉय और अनु अग्रवाल बड़े सितारे नहीं थे। उनके नाम पर ऑडियंस को सिनेमाघरों तक खींचना आसान नहीं था।
ऐसे में पोस्टर ने कलाकारों की पहचान को सामने रखने के बजाय एक अलग दृश्य के जरिए लोगों का ध्यान खींचा। चेहरे छिपाने का यह तरीका फिल्म की प्रेम कहानी के मिजाज से भी मेल खाता था और ऑडियंस में उत्सुकता भी पैदा करता था।
आज जब फिल्मी पोस्टरों में बड़े सितारों के चेहरे, डिजिटल डिजाइन और भव्य तस्वीरें देखने को मिलती हैं, तब ‘आशिकी’ का यह पोस्टर याद दिलाता है कि प्रचार के लिए हमेशा सब कुछ दिखाना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी कुछ छिपाकर भी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया जा सकता है।