
मनोरंजन डेस्क। फिल्मों में जब हीरो विलेन को थप्पड़ मारता है, मुक्का पड़ते ही सामने वाला दूर जा गिरता है या किसी लड़ाई के दौरान हड्डी टूटने की आवाज सुनाई देती है, तो सीन काफी असली लगता है। कई बार आवाज इतनी तेज और प्रभावशाली होती है कि दर्शक भी चौंक जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शूटिंग के दौरान क्या सच में इतने जोर से मुक्के मारे जाते हैं या हड्डियां टूटती हैं? असल में, इन दृश्यों को दमदार बनाने में साउंड डिजाइन का बड़ा हाथ होता है।
फिल्मों में सुनाई देने वाली कई आवाजें सेट पर रिकॉर्ड नहीं की जातीं। इन्हें बाद में स्टूडियो में तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया को फॉली साउंड (Foley Sound) और साउंड डिजाइनिंग कहा जाता है। इसमें रोजमर्रा की चीजों और अलग-अलग तकनीकों की मदद से ऐसी आवाजें बनाई जाती हैं, जो पर्दे पर दिख रहे एक्शन को ज्यादा वास्तविक बनाती हैं।
फिल्मों में थप्पड़ या मुक्का पड़ने की आवाज के लिए कलाकारों को सच में एक-दूसरे को जोर से मारने की जरूरत नहीं होती। शूटिंग के दौरान सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है और कई बार कैमरे के एंगल से ऐसा दिखाया जाता है, जैसे मुक्का सीधे चेहरे पर लगा हो।
इसके बाद साउंड डिजाइनर उस सीन के हिसाब से आवाज तैयार करते हैं। इसके लिए चमड़े पर हाथ मारने, मोटे कपड़े को झटकने या किसी गद्देदार सतह पर प्रहार करने जैसी आवाजों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कभी-कभी एक ही आवाज को कई अलग-अलग ध्वनियों के साथ मिलाया जाता है, ताकि मुक्के का असर ज्यादा गहरा लगे।
उदाहरण के लिए, किसी सामान्य मुक्के के लिए हल्की और तेज आवाज रखी जा सकती है, जबकि किसी भारी प्रहार के लिए उसमें कम फ्रीक्वेंसी वाली गहरी आवाज जोड़ी जाती है। आवाज की तीव्रता और समय का तालमेल भी जरूरी होता है। अगर मुक्का पड़ने से पहले ही आवाज सुनाई दे जाए, तो सीन नकली लग सकता है।
एक्शन फिल्मों में हड्डी टूटने की आवाज सुनकर ऐसा लगता है, जैसे शरीर के अंदर कुछ सचमुच टूट गया हो। लेकिन ऐसी आवाज तैयार करने के लिए असली हड्डी तोड़ने की जरूरत नहीं होती।
साउंड डिजाइनर अलग-अलग चीजों से प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, सूखी लकड़ी की पतली छड़ी तोड़ने, कठोर सब्जी काटने या किसी कुरकुरी चीज को दबाने से मिलने वाली आवाजों को रिकॉर्ड किया जा सकता है। फिर इन आवाजों को एडिट करके फिल्म के दृश्य के मुताबिक इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि, हर फिल्म में एक ही तरीका नहीं अपनाया जाता। किसी दृश्य में हड्डी टूटने की आवाज को छोटा और तेज रखा जाता है, जबकि किसी दूसरे सीन में उसमें गहरी आवाज या हल्की चरमराहट जोड़ी जा सकती है। मकसद सिर्फ आवाज पैदा करना नहीं, बल्कि दर्शक को यह महसूस कराना होता है कि पर्दे पर क्या हो रहा है।
फिल्म में कोई आवाज सिर्फ तेज होने से प्रभावशाली नहीं बनती। उसका समय, गहराई, आसपास के माहौल से तालमेल और दूसरी आवाजों के साथ संतुलन भी उतना ही जरूरी होता है।
साउंड डिजाइनर सबसे पहले सीन को समझते हैं। इसके बाद तय किया जाता है कि वहां किस तरह की आवाज चाहिए। कई बार एक ही प्रभाव के लिए अलग-अलग रिकॉर्डिंग को मिलाया जाता है। इसे साउंड लेयरिंग कहा जाता है। जरूरत के अनुसार आवाज की गति, पिच और वॉल्यूम में भी बदलाव किया जाता है।
इसके अलावा, फिल्म में कलाकारों के संवाद, कदमों की आहट, कपड़ों की आवाज, गिरने की ध्वनि और बैकग्राउंड म्यूजिक भी एक्शन सीन को प्रभावशाली बनाने में योगदान देते हैं। अगर मुक्का पड़ने की आवाज तो सुनाई दे, लेकिन कलाकार के गिरने या आसपास की प्रतिक्रिया का तालमेल न हो, तो दृश्य का असर कम हो सकता है।
फिल्म की शूटिंग के दौरान कैमरा, लाइटिंग और आसपास के लोगों की वजह से कई आवाजें साफ रिकॉर्ड नहीं हो पातीं। इसलिए पोस्ट-प्रोडक्शन के दौरान उन्हें दोबारा तैयार किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में फॉली आर्टिस्ट पर्दे पर दिख रहे कलाकारों की गतिविधियों के मुताबिक आवाजें रिकॉर्ड करते हैं।
वे स्टूडियो में चलते हुए कदमों, कपड़ों की हलचल, गिरने और दूसरी गतिविधियों की आवाजें तैयार करते हैं। एक्शन सीन में भी जरूरत के अनुसार ऐसी रिकॉर्डिंग जोड़ी जा सकती हैं। इसके बाद साउंड एडिटर और मिक्सिंग टीम सभी आवाजों को इस तरह संतुलित करती है कि वे दृश्य का स्वाभाविक हिस्सा लगें।
यही वजह है कि फिल्म में सुनाई देने वाला हर थप्पड़, मुक्का या हड्डी टूटने की आवाज जरूरी नहीं कि शूटिंग के समय ही रिकॉर्ड हुई हो। कई बार पर्दे पर दिखने वाला एक छोटा-सा एक्शन सीन भी आवाजों की कई परतों से मिलकर बनता है। दर्शक को यह पूरी प्रक्रिया दिखाई नहीं देती, लेकिन वही बारीकियां एक साधारण दृश्य को दमदार सिनेमाई अनुभव में बदल देती हैं।
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