
मनोरंजन डेस्क। हिंदी के ‘दुर्गा है मेरी मां’ से बंगाल के ‘जागो दुर्गा’ और महाराष्ट्र की ‘दुर्गे दुर्घट भारी’ तक, हर भाषा में अलग अंदाज में मां दुर्गा के गीत गाए जाते हैं।
नवरात्रि हो, दुर्गा पूजा हो या माता का जागरण, मां दुर्गा के गीतों के बिना इन आयोजनों की कल्पना अधूरी लगती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में देवी की आराधना के लिए अलग भाषाओं में गीत गाए जाते हैं। कहीं हिंदी में माता की महिमा का गुणगान होता है, तो कहीं बंगाली गीतों में मां दुर्गा के आगमन का उत्सव मनाया जाता है। गुजरात में गरबा की थाप पर देवी की आराधना होती है, वहीं महाराष्ट्र में पारंपरिक आरती के जरिए मां से संकट दूर करने की प्रार्थना की जाती है।
इन गीतों के धुन और गायन का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन इनमें एक समान भावना दिखाई देती है। भक्त मां को शक्ति, सुरक्षा और करुणा का प्रतीक मानकर उन्हें पुकारते हैं। कई गीतों में मां को अपने घर आने वाली बेटी की तरह देखा जाता है, तो कहीं उनसे दुख दूर करने और मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना की जाती है। यही वजह है कि देवी गीत केवल धार्मिक संगीत नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृति और भावनाओं का भी हिस्सा हैं।
हिंदी: ‘दुर्गा है मेरी मां, अंबे है मेरी मां’
हिंदी के लोकप्रिय देवी भजनों में ‘दुर्गा है मेरी मां, अंबे है मेरी मां’ का नाम लिया जाता है। इस गीत में मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और विश्वास का भाव दिखाई देता है। भक्त मां को अपना सहारा मानते हैं और उनसे शक्ति, सुरक्षा और आशीर्वाद की कामना करते हैं। हिंदी के देवी भजनों में मां को परिवार के सदस्य की तरह पुकारने की परंपरा काफी मजबूत है। यहां देवी के प्रति श्रद्धा के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी नजर आता है।
बंगाली: ‘जागो दुर्गा, जागो दशप्रहरणधारिणी’
बंगाल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव भी है। ‘जागो दुर्गा, जागो दशप्रहरणधारिणी’ जैसे गीतों में देवी का आह्वान किया जाता है। वहीं ‘दुग्गा एलो’ और ‘ढाक बाजा काशोर बाजा’ जैसे गीत दुर्गा पूजा के उत्साह और उल्लास को सामने लाते हैं।
बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को अपने मायके आने वाली बेटी उमा के रूप में भी देखा जाता है। इसी भाव के कारण दुर्गा पूजा के आगमन से जुड़े गीतों में खुशी के साथ भावुकता भी मिलती है। महालया के मौके पर ‘महिषासुरमर्दिनी’ का पाठ सुनने की परंपरा भी बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि संगीत, संस्कृत श्लोकों और चंडीपाठ से जुड़ा विशेष रेडियो कार्यक्रम है।
भोजपुरी: ‘निमिया के डाढ़ मइया’
भोजपुरी क्षेत्र में देवी गीतों की अपनी अलग पहचान है। ‘निमिया के डाढ़ मइया’ जैसे पारंपरिक देवी गीतों में लोकजीवन और मां के प्रति श्रद्धा का मेल दिखाई देता है। नीम के पेड़, गांव का वातावरण, मंदिर और माता की पूजा जैसे प्रतीक इन गीतों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ते हैं।
भोजपुरी देवी गीतों में भक्त अक्सर मां से अपनी परेशानी बताते हैं और उन्हें अपने घर या गांव में आने का निमंत्रण देते हैं। इन गीतों की सरल भाषा और लोकधुन उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाती है। यहां भक्ति का भाव रोजमर्रा के जीवन और पारिवारिक रिश्तों से जुड़ा दिखाई देता है।
मैथिली: ‘जय जय भैरवि असुर भयाउनि’
मैथिली की भक्ति परंपरा में ‘जय जय भैरवि असुर भयाउनि’ एक प्रसिद्ध स्तुति है। इसे विद्यापति की रचना के रूप में जाना जाता है। इस स्तुति में देवी के शक्तिशाली स्वरूप की वंदना की जाती है। इसके बोलों में देवी को असुरों का भय दूर करने वाली और भक्तों की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में याद किया गया है।
मैथिली और भोजपुरी जैसे क्षेत्रों की लोकभक्ति में स्थानीय भाषा का खास महत्व है। संस्कृत के कठिन धार्मिक शब्दों के बजाय अपनी भाषा में देवी को पुकारने से भक्तों को उनसे भावनात्मक जुड़ाव महसूस होता है।
गुजराती: ‘जय आद्या शक्ति’ और ‘मां पावा ते गढ़ थी उतर्या’
गुजरात में नवरात्रि का नाम आते ही गरबा और डांडिया की याद आती है। ‘जय आद्या शक्ति’ देवी की प्रसिद्ध आरती है, जिसे नवरात्रि के दौरान गाया जाता है। वहीं ‘मां पावा ते गढ़ थी उतर्या’ जैसे पारंपरिक गरबा गीत देवी की महिमा और उत्सव की भावना को सामने लाते हैं।
गुजराती देवी गीतों की खासियत यह है कि इनमें भक्ति के साथ सामूहिक नृत्य भी जुड़ जाता है। लोग गोल घेरा बनाकर तालियों और डांडिया की लय पर नाचते हैं। इस तरह संगीत पूजा का हिस्सा होने के साथ सामाजिक मेल-मिलाप का माध्यम भी बन जाता है।
मराठी: ‘दुर्गे दुर्घट भारी’
महाराष्ट्र में मां दुर्गा की आराधना से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध आरतियों में ‘दुर्गे दुर्घट भारी’ का नाम लिया जाता है। इस आरती में देवी को संकट दूर करने वाली और असहाय लोगों का सहारा बनने वाली मां के रूप में पुकारा गया है।
इसके बोलों में भक्त मां से करुणा बरसाने और परेशानियों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करता है। इस गीत की एक खास बात इसका दोहराया जाने वाला जयकारा है, जिसमें देवी की महिमा का गुणगान किया जाता है। सामूहिक आरती के दौरान यही दोहराव भक्तों को एक साथ गाने और पूजा में शामिल होने का अवसर देता है।
असमिया: दुर्गा पूजा के गीत और सामूहिक भक्ति
असम में भी दुर्गा पूजा के दौरान देवी की आराधना के लिए भक्ति संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यहां देवी गीतों के साथ स्थानीय संगीत परंपराओं और सामूहिक पूजा का मेल दिखाई देता है। हालांकि, असमिया में किसी एक गीत को पूरे देश में सबसे प्रसिद्ध देवी गीत कहना मुश्किल है, क्योंकि गीतों की लोकप्रियता क्षेत्र और समुदाय के अनुसार बदलती है।
असमिया दुर्गा पूजा के गीतों को समझने के लिए स्थानीय कलाकारों, पूजा समितियों और क्षेत्रीय संगीत परंपराओं को देखना जरूरी है। इससे पता चलता है कि एक ही देवी की आराधना अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय संस्कृति के रंग के साथ सामने आती है।
अलग-अलग भाषाओं के इन गीतों को देखें, तो इनमें कुछ भाव बार-बार सामने आते हैं। सबसे पहले, मां दुर्गा को शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। दूसरे, भक्त उनसे अपने दुख दूर करने और मुश्किल समय में सहारा देने की प्रार्थना करते हैं। तीसरे, कई गीतों में मां और भक्त का रिश्ता बेहद निजी दिखाई देता है। मां को केवल पूजनीय देवी नहीं, बल्कि अपनी मां, रक्षक और परिवार का हिस्सा माना जाता है।
संगीत के स्तर पर भी दोहराए जाने वाले शब्द, सामूहिक गायन, तालियां और ढोल जैसे वाद्य कई परंपराओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, सभी गीतों की धुन या ताल एक जैसी नहीं होती। बंगाल के ढाक की गूंज, गुजरात के गरबा की लय और महाराष्ट्र की आरती का अंदाज एक-दूसरे से अलग है।
इन गीतों की असली समानता किसी एक धुन में नहीं, बल्कि उस भावना में है जो उन्हें सुनने और गाने वालों को जोड़ती है। भाषा बदल जाती है, संगीत का तरीका बदल जाता है, लेकिन मां को पुकारने, उनसे शक्ति मांगने और उनके आगमन का उत्सव मनाने की परंपरा अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।