
रामनाथ मुटकुळे, नईदुनिया, इंदौर। मराठी फिल्मों में नाना पाटेकर की मां की भूमिका निभाने वाली मशहूर लावणी कलाकार मधु कांबीकर का 12 अक्टूबर को पुणे में 73 साल की उम्र में निधन हो गया। मशहूर एक्ट्रेस और लावणी कलाकार दिवंगत एक्टर नाना पाटेकर की मां का किरदार निभाने वाली मधु कांबीकर अब इस दुनिया में नहीं रही हैं। वे लंबे समय से बीमार चल रही थीं। मराठी फिल्मों, थिएटर और टेलीविजन में अपने काम के लिए मशहूर मधु कांबीकर ने अपने अभिनय और लावणी नृत्य कला से अपनी अलग पहचान बनाई थी। इसके अलावा उन्होंने कई नाटकों में भी अभिनय किया था।
'हेच माझा माहेर', 'राघुमैना', 'एक होता विदूषक', 'झपटलेला', 'देबू' और 'येऊ का घरात' जैसी मराठी फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शक हमेशा याद रखेंगे। अभिनय और नृत्य का बेहतरीन तालमेल बिठाकर, उन्होंने ग्रामीण जीवन से जुड़ी लोक कलाओं को लोकप्रिय बनाने की लगातार कोशिश की। चार दशकों से भी ज्यादा समय तक कला के क्षेत्र में सक्रिय रहकर उन्होंने मराठी मनोरंजन जगत को समृद्ध किया।


'शापित', 'एक होता विदूषक' और 'झपाटलेला' जैसी प्रसिद्ध फिल्मों से अभिनय की छाप छोड़ने वाली वरिष्ठ अभिनेत्री और लावणी साम्राज्ञी मधु कांबीकर तीन दशक से अधिक समय तक फिल्म जगत में सक्रिय रहीं। 'शापित' फिल्म से प्रसिद्धि पाने वाली और 'एक होता विदूषक' फिल्म में अपनी भूमिका से दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने वाली मधु कांबीकर ने प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी अभिनय क्षमता के दम पर मराठी फिल्म जगत में एक अलग पहचान बनाई। नगर जिले के कांबी गांव से शुरू हुई उनकी इस यात्रा में कई संकट आए, लेकिन उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया और आत्मविश्वास के साथ हर परिस्थिति का सामना किया। उनका मन स्कूल में नहीं लगा, लेकिन तमाशा के फड़ में उन्होंने पैरों में घुंघरू बांधे और वहां की हर परीक्षा में एक के बाद एक मुकाम हासिल करती गईं।
पारंपरिक लावणी को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने लावणी की परंपरा को जीवंत रखने और मूल लावणी को लोगों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास किए। लावणी प्रेमियों को इस नृत्य के इतिहास का पता चल सके, इसके लिए उन्होंने लावणी से जुड़ा सारा लिखित साहित्य एकत्र किया और उसके जरिए तमाशा के इतिहास को पिरोने का महत्वपूर्ण काम किया। इस कठिन काम को सफलतापूर्वक पूरा करने में मधु कांबीकर को उनके तमाशा दल के 11 कलाकारों ने भरपूर सहयोग दिया।

इसी इतिहास पर आधारित 'सखी माझी लावणी' कार्यक्रम कांबीकर द्वारा मंच पर प्रस्तुत किया जाता था। उन्होंने पुणे के बालासाहेब भोसले से कथक का प्रशिक्षण लिया था। इसके बाद पुणे में ही उनकी कला फली-फूली और विकसित हुई। इतना ही नहीं, उन्हें पेशवा कालीन परंपरा को मंच पर प्रस्तुत करने का गौरव भी प्राप्त हुआ। 'शापित' फिल्म ने भारतीय फिल्म जगत को मधु कांबीकर के भीतर की अभिनेत्री से परिचित कराया। 'एक होता विदूषक' में पारंपरिक लावणी के दर्शन कराने के लिए उषा नाइक और मधु कांबीकर को लिया गया था।

'भरलं आभाळ पावसाळी पाहुणा गं बाई, श्रावणाचं उन मला झेपेना' या 'कुटं तुमी गेला होता सांगा कारभारी' जैसी लावणियों में मधु कांबीकर की अदाएं एक सच्ची लावणी कलाकार की गवाही देती हैं। 'एक होता विदूषक' की तरह ही 'झपाटलेला' में लक्ष्या की मां की भूमिका और संत गाडगे बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म 'देबू' में देबू की मां की भूमिका को भी उन्होंने यादगार बना दिया। दादा कोंडके के साथ 'येऊ का घरात', 'मला घेऊन चला' जैसी फिल्में करके उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वह किसी भी प्रकार की भूमिका निभा सकती हैं।

फिल्मों में प्रवेश करने से पहले प्रभाकर पणशिकर ने उन्हें 'पुत्रकामेष्टी' नाटक में काम करने के लिए बुलाया था। उन्हें उस वर्ष का 'नाट्यदर्पण' का 'विशेष लक्ष्यवेधी अभिनेत्री' (विशेष ध्यान आकर्षित करने वाली अभिनेत्री) का पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके बाद मधु कांबीकर ने 'पेईंग गेस्ट', 'चंद्र जिथे उगवत नाही', 'आकाश पेलताना', 'फुलवंती' जैसे 19 नाटकों में काम किया।

इसी दौरान उन्होंने 'सतीची पुण्याई', 'दगा', 'लक्ष्मी' जैसी फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी निभाईं। स्नेहलता दसनूरकर के उपन्यास 'वज्रदीप' पर आधारित फिल्म 'शापित' की पटकथा ग. रा. कामत ने लिखी थी। इसमें मधु कांबीकर को 'बिजली' नाम की एक ग्रामीण, अनपढ़ और बंधुआ मजदूर पुरुष की पत्नी की भूमिका निभानी थी।
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चूंकि उनका अपना बचपन गाँव में बीता था, इसलिए उनके लिए यह भूमिका निभाना आसान हो सकता था, फिर भी इस किरदार के साथ पूरा न्याय करने के लिए उन्होंने दोबारा गामव जाकर ग्रामीण स्त्री की देह-भाषा (बॉडी लैंग्वेज) का अध्ययन किया और उन भावनाओं को अपने किरदार में पूरी तरह उतारा।