
मनोरंजन डेस्क। आज यानी 3 नवंबर को हिंदी सिनेमा के दिग्गज एक्टर रहे पृथ्वीराज कपूर की 120वीं जयंती है। उन्होंने फिल्मों में खूब नाम और शोहरत कमाई, लेकिन उनका दिल हमेशा थिएटर के लिए धड़कता रहा। वह सिर्फ एक बड़े फिल्म एक्टर ही नहीं थे, बल्कि रंगमंच को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी के कई साल लगा दिए। उनकी थिएटर के प्रति दीवानगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिल्मों में बड़ा नाम कमाने और राज्यसभा सांसद बनने के बाद भी वह अपनी थिएटर टीम के साथ ट्रेन के तीसरे दर्जे में सफर करते थे।
आइए, उनकी जिंदगी से जुड़े इस दिलचस्प किस्से और थिएटर के लिए उनके योगदान के बारे में जानते हैं।
पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को अविभाजित भारत के पंजाब के समुंदरी में हुआ था। यह जगह अब पाकिस्तान में है। बचपन से ही उन्हें एक्टिंग का शौक था। पढ़ाई के दौरान पेशावर में भी उन्होंने थिएटर में काम किया। उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की, लेकिन उनका मन वकालत में नहीं लगा। उन्हें हमेशा लगता था कि उनका असली रास्ता एक्टिंग है।
अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह साल 1928 में मुंबई पहुंच गए। शुरुआत में उन्हें छोटे-मोटे किरदार मिले, लेकिन उन्होंने मेहनत जारी रखी। साल 1931 में आई फिल्म ‘आलम आरा’ से उन्हें बड़ी पहचान मिली। यह भारत की पहली बोलती फिल्म थी।
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इसके बाद पृथ्वीराज कपूर ने कई यादगार फिल्मों में काम किया। साल 1941 में आई सोहराब मोदी की फिल्म ‘सिकंदर’ में उन्होंने सिकंदर का किरदार निभाया। वहीं, ‘आवारा’ और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी फिल्मों में भी उनके एक्टिंग को खूब पसंद किया गया। खासकर ‘मुगल-ए-आजम’ में बादशाह अकबर के किरदार ने उन्हें दर्शकों के बीच खास पहचान दिलाई।
इतनी सफलता मिलने के बाद भी पृथ्वीराज कपूर सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहना चाहते थे। उनका सपना था कि थिएटर को देश के छोटे-बड़े शहरों तक पहुंचाया जाए, ताकि आम लोग भी नाटक देख सकें।
पृथ्वीराज कपूर ने अपने इस सपने को पूरा करने के लिए साल 1944 में ‘पृथ्वी थिएटर्स’ की शुरुआत की। यह एक ऐसी नाटक मंडली थी, जो देश के अलग-अलग शहरों में जाकर नाटक पेश करती थी। उस दौर में फिल्मों का आकर्षण बढ़ रहा था, लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने थिएटर को अपनी प्राथमिकता बनाए रखा।
पृथ्वी थिएटर्स का पहला नाटक ‘शकुंतला’ था, जो कालिदास के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक पर आधारित था। इसके बाद मंडली ने ‘दीवार’, ‘पठान’, ‘गद्दार’, ‘आहुति’ और ‘पैसा’ जैसे कई नाटक पेश किए। इन नाटकों में मनोरंजन के साथ समाज से जुड़े मुद्दों को भी जगह दी गई। देश का बंटवारा, सांप्रदायिक सौहार्द, गरीबी और सामाजिक समस्याएं जैसे विषय उनके नाटकों का हिस्सा बने।
पृथ्वी थिएटर्स का सफर आसान नहीं था। कलाकारों और तकनीकी टीम के साथ नाटक का सामान लेकर एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था। थिएटर की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, करीब 16 साल के सफर में इस मंडली ने 112 शहरों में कुल 2,662 शो किए। सबसे खास बात यह थी कि पृथ्वीराज कपूर ने इन सभी शो में खुद मुख्य भूमिका निभाई। यानी वह सिर्फ मंडली के मालिक बनकर नहीं रहते थे, बल्कि हर बार मंच पर उतरकर दर्शकों के सामने एक्टिंग करते थे। इस दौरान औसतन हर तीसरे दिन एक शो होता था।
पृथ्वीराज कपूर की थिएटर के प्रति लगन का सबसे दिलचस्प पहलू उनके सफर से जुड़ा है। साल 1952 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया। वह 1960 तक इस पद पर रहे। इसके बावजूद उनके रहन-सहन और काम करने के तरीके में कोई खास बदलाव नहीं आया।
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वह अपनी थिएटर मंडली के साथ ट्रेन के तीसरे दर्जे में सफर करते थे। उनके लिए यह जरूरी नहीं था कि वह फिल्मों के बड़े सितारे हैं या संसद के सदस्य। वह अपनी टीम के साथ रहना और देश के अलग-अलग हिस्सों में नाटक करना पसंद करते थे। उनके लिए थिएटर किसी शौक से बढ़कर था।
उनके समर्पण से जुड़ा एक और किस्सा भी काफी दिलचस्प है। आकाशवाणी के एक पुराने कार्यक्रम के मुताबिक, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें विदेश जाने वाले एक सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, पृथ्वीराज कपूर ने यह कहते हुए प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया कि वह थिएटर का काम छोड़कर विदेश नहीं जा सकते। यह किस्सा बताता है कि थिएटर उनके लिए सिर्फ काम नहीं, बल्कि जिंदगी का अहम हिस्सा था।
लगातार यात्राएं करना और इतनी बड़ी थिएटर मंडली को संभालना आसान नहीं था। समय के साथ फिल्मों का प्रभाव बढ़ने लगा और मंडली को चलाने में आर्थिक परेशानियां भी आने लगीं। पृथ्वीराज कपूर की तबीयत भी खराब रहने लगी। इसके चलते करीब 1960 में पृथ्वी थिएटर्स की घूमने वाली मंडली का सफर थम गया।
हालांकि, पृथ्वीराज कपूर का थिएटर को लेकर सपना खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने मुंबई के जुहू में एक स्थायी थिएटर बनाने के लिए जमीन ली थी। वह चाहते थे कि कलाकारों को ऐसा मंच मिले, जहां वे लगातार नाटक कर सकें। लेकिन उनका यह सपना उनके जीवनकाल में पूरा नहीं हो पाया।

29 मई 1972 को पृथ्वीराज कपूर का निधन हो गया। उनके जाने के बाद बेटे शशि कपूर और बहू जेनिफर कपूर ने उनके सपने को आगे बढ़ाया। आखिरकार 5 नवंबर 1978 को मुंबई में पृथ्वी थिएटर की शुरुआत हुई। आज यह थिएटर देश के मशहूर रंगमंच स्थलों में गिना जाता है और नए कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका देता है।
पृथ्वीराज कपूर को साल 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। साल 1971 में उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार भी मिला। हिंदी सिनेमा में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है। उनकी विरासत सिर्फ उनकी फिल्मों या कपूर परिवार तक सीमित नहीं है। उन्होंने थिएटर को देशभर में पहुंचाने के लिए जो मेहनत की, वह भी भारतीय रंगमंच के इतिहास का अहम हिस्सा है।