
मनोरंजन डेस्क। फिल्मों में जब कोई हीरो दमदार डायलॉग बोलता है, तो थिएटर में तालियां बजने लगती हैं। कभी उसकी आवाज में गुस्सा होता है, कभी दर्द, तो कभी रोमांस। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पर्दे पर जिस आवाज को सुनकर आप हीरो के फैन बन जाते हैं, वह असल में उस एक्टर की हो ही नहीं?
भारतीय सिनेमा में कई बार पर्दे पर दिखने वाले कलाकार के लिए किसी दूसरे कलाकार ने अपनी आवाज दी है। इसे डबिंग या वॉयस डबिंग कहा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि दर्शकों को प्रभावित करने में ज्यादा भूमिका किसकी होती है- चेहरे की या आवाज की?
भारतीय सिनेमा में डबिंग का इस्तेमाल कई कारणों से होता है। कभी किसी एक्टर की आवाज किरदार के मुताबिक नहीं लगती, तो कभी भाषा की वजह से डबिंग की जरूरत पड़ती है। साउथ की फिल्मों को हिंदी में रिलीज करते समय अक्सर हिंदी वॉयस आर्टिस्ट की मदद ली जाती है। वहीं, कुछ फिल्मों में एक्टर की अपनी आवाज की जगह किसी दूसरे कलाकार की आवाज इस्तेमाल की जाती है।
उदाहरण के लिए, फिल्म लगान में एक्टर आमिर खान की आवाज उनकी अपनी थी, लेकिन फिल्मों के दूसरे संस्करणों और भाषाओं में डबिंग की भूमिका अलग हो सकती है। इसी तरह, कई दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी वर्जन में हिंदी डबिंग कलाकारों ने एक्टरओं के किरदारों को नई पहचान दी है।
डबिंग सिर्फ शब्दों को दूसरी भाषा में बदलने का काम नहीं है। इसमें किरदार के मूड, बोलने के अंदाज, भावनाओं और संवादों के असर को बनाए रखना भी जरूरी होता है।
किसी एक्टर का चेहरा दर्शकों को किरदार से जोड़ सकता है, लेकिन आवाज उस किरदार की भावनाओं को और प्रभावशाली बना सकती है। उदाहरण के लिए, एक ही डायलॉग को अलग-अलग आवाजों में बोलने पर उसका असर बदल सकता है। भारी आवाज किसी किरदार को गंभीर बना सकती है, जबकि नरम आवाज उसके भावनात्मक पक्ष को उभार सकती है।
डबिंग आर्टिस्ट को एक्टर के होंठों की गतिविधियों के साथ संवादों का तालमेल बैठाना पड़ता है। साथ ही, उसे दृश्य के हिसाब से आवाज में गुस्सा, खुशी, डर या दर्द भी लाना होता है। यही वजह है कि अच्छी डबिंग के लिए भाषा की जानकारी के साथ अभिनय की समझ भी जरूरी होती है।
कई बार दर्शक किसी फिल्म के हिंदी वर्जन से इतने जुड़ जाते हैं कि उनके लिए उस एक्टर की आवाज और चेहरा एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं। इससे डबिंग कलाकार का योगदान भी साफ दिखाई देता है।
इसका जवाब किसी एक नाम में नहीं दिया जा सकता। एक्टर अपने चेहरे, हाव-भाव, बॉडी लैंग्वेज और अभिनय से किरदार को पर्दे पर जीवंत करता है। वहीं, डबिंग आर्टिस्ट अपनी आवाज और भावनाओं से उस किरदार को दर्शकों तक पहुंचाने में मदद करता है।
फिल्म निर्माण एक टीम का काम है, जिसमें कैमरे के सामने और पीछे काम करने वाले कई लोगों का योगदान होता है। अगर एक्टर किरदार का दृश्य रूप तैयार करता है, तो डबिंग आर्टिस्ट उसकी आवाज को नया रूप दे सकता है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन कई फिल्मों में दोनों का तालमेल किरदार के प्रभाव को बढ़ाता है।
इसलिए अगली बार जब किसी फिल्म का डायलॉग आपको बेहद पसंद आए, तो सिर्फ पर्दे पर दिखने वाले चेहरे के बारे में ही नहीं, उस आवाज के पीछे मौजूद कलाकार के योगदान के बारे में भी सोचिए। क्योंकि सिनेमा में स्टारडम सिर्फ दिखाई देने से नहीं, बल्कि दर्शकों तक भावनाएं पहुंचाने से भी बनता है।
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