
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मोबाइल, टीवी और लैपटॉप की स्क्रीन पर घंटों बिताना बच्चों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर रहा है। डिजिटल दुनिया में अधिक समय बिताने वाले बच्चों में बोलने में देरी, दूसरों से घुलने-मिलने में परेशानी और व्यवहार संबंधी समस्याएं सामने आ रही हैं।
शहर के अस्पतालों में ऐसे बच्चों को लेकर पहुंचने वाले अभिभावकों की संख्या भी बढ़ रही है। हालांकि, स्क्रीन टाइम को सीधे आटिज्म का कारण नहीं माना जा सकता, लेकिन कम उम्र में इसका अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के विकास पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर 6 महीने से 3 साल की उम्र के बीच दिखाई देने लगते हैं। आटिज्म के इलाज में लगने वाला समय भी हर बच्चे में अलग-अलग होता है। यह बच्चे की उम्र, आटिज्म के स्तर, लक्षणों की गंभीरता और थेरेपी शुरू होने के समय पर निर्भर करता है। एकल परिवारों में कई अभिभावक बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल थमा देते हैं।
इससे बच्चों को परिवार के साथ बातचीत, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाते। कुछ बच्चे मोबाइल पर देखे गए गेम और वीडियो के कैरेक्टर की तरह व्यवहार करने लगते हैं। चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहना और दूसरे बच्चों के साथ खेलने में रुचि नहीं लेना जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं।
बाल विकास एवं व्यवहार विशेषज्ञ डाॅ. अरुण पाटीदार के अनुसार, बच्चों के व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मोबाइल पर देखे गए कंटेंट की नकल करना या असामान्य व्यवहार दिखाना विकास संबंधी समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसे में विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है।
एमवाय अस्पताल के थेरेपिस्ट गौतम सुनारे के अनुसार, डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के सामाजिक और भावनात्मक विकास में बाधा बन सकता है। बच्चे वास्तविक दुनिया से दूरी बनाने लगते हैं। इसे आम बोलचाल में वर्चुअल आटिज्म कहा जाता है, लेकिन यह आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर का आधिकारिक निदान नहीं है।
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ऑटिज्म बच्चों के मस्तिष्क के विकास से जुड़ी न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है। इसके पीछे आनुवंशिक और जैविक कारक प्रमुख माने जाते हैं। इसके लक्षण आमतौर पर शुरुआती बचपन में दिखाई देने लगते हैं। नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देना, आंखों से संपर्क कम करना, बोलने में देरी, दूसरों के साथ खेलने में रुचि नहीं लेना और एक ही गतिविधि बार-बार करना इसके प्रमुख संकेत हैं। आटिज्म की पहचान के लिए कोई एक टेस्ट नहीं होता। विशेषज्ञ बच्चे के व्यवहार, सामाजिक संपर्क और विकास के इतिहास का आकलन करके इसका निदान करते हैं।
एमवाय अस्पताल के फिजियोथेरेपी विभाग प्रभारी मनीष गोयल के अनुसार, विभाग में रोजाना करीब 60 बच्चे नियमित थेरेपी लेते हैं, जबकि प्रतिदिन पांच नए संदिग्ध बच्चे पहुंचते हैं। इस तरह महीने में लगभग 150 और सालभर में करीब 1800 बच्चे जांच के लिए आते हैं। विभाग के अनुमान के मुताबिक, महीने में 25 से 30 और सालभर में लगभग 300 बच्चों में आटिज्म की पुष्टि होती है। इनमें करीब 80 प्रतिशत लड़के और 20 प्रतिशत लड़कियां हैं। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, एक साल में 200 से 250 लड़के और 40 से 60 लड़कियां उपचार के लिए पहुंचीं।
ऑटिज्म का कोई एक पूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन समय पर पहचान और नियमित थेरेपी से बच्चों की संवाद क्षमता, व्यवहार और सीखने की क्षमता में सुधार संभव है। स्पीच थेरेपी से बोलने और अपनी बात समझाने, आक्यूपेशनल थेरेपी से रोजमर्रा के काम करने, बिहेवियर थेरेपी से व्यवहार सुधारने और प्ले थेरेपी से सामाजिक जुड़ाव विकसित करने में मदद मिलती है। जरूरत के अनुसार फिजियोथेरेपी और स्पेशल एजुकेशन भी दी जाती है।