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गांधी के चार प्रवास, जबलपुर से जुड़ा आजादी का इतिहास

राष्ट्रीय सांस्कृतिक आडियो-विजुअल अभिलेखागार में इस अवसर की 8 मिनट 16 सेकेंड की फिल्म आज भी सुरक्षित है। अभिलेख में इसे 12 फरवरी 1948 को जबलपुर में गा...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Fri, 02 Oct 2026 10:39:47 AM (IST)Updated Date: Fri, 02 Oct 2026 10:52:43 AM (IST)
गांधी के चार प्रवास, जबलपुर से जुड़ा आजादी का इतिहास
27 फरवरी 1941 को गांधीजी तीसरी बार जबलपुर आए। इतिहासकार डा. आनंद सिंह राणा

HighLights

  1. राष्ट्रीय सांस्कृतिक आडियो-विजुअल अभिलेखागार में फिल्म आज भी सुरक्षित
  2. असहयोग से हरिजनोद्धार और निर्णायक संघर्ष तक जुड़ा रहा जबलपुर प्रवास
  3. 12 फरवरी 1948 को जबलपुर में अस्थियों के विसर्जन का दृश्य बताया गया है

सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया, जबलपुर। महात्मा गांधी का जबलपुर से रिश्ता केवल चार यात्राओं का इतिहास नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के बदलते पड़ावों का जीवंत दस्तावेज है। बापू 20 मार्च 1921 से 27 अप्रैल 1942 के बीच चार बार जबलपुर आए और कुल आठ दिन संस्कारधानी में बिताए।

इन प्रवासों में असहयोग आंदोलन के विस्तार, स्वराज कोष के लिए जनजागरण, हरिजनोद्धार अभियान, नर्मदा और भेड़ाघाट के दर्शन से लेकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष की तैयारियों तक अलग-अलग उद्देश्य जुड़े थे। जीवनकाल की इन चार यात्राओं के बाद भी जबलपुर से गांधीजी का रिश्ता टूटा नहीं।


12 फरवरी 1948 को उनकी अस्थियों का तिलवारा घाट पर नर्मदा में विसर्जन हुआ। राष्ट्रीय सांस्कृतिक आडियो-विजुअल अभिलेखागार में इस ऐतिहासिक अवसर की 8 मिनट 16 सेकेंड की फिल्म आज भी सुरक्षित है। अभिलेख में इसे 12 फरवरी 1948 को जबलपुर में गांधीजी की अस्थियों के विसर्जन का दृश्य बताया गया है।

गोल बाजार की सभा से जगी स्वराज की चेतना

गांधी पहली बार 20 मार्च 1921 को जबलपुर पहुंचे। असहयोग आंदोलन को गति देना और स्वराज कोष के लिए धन जुटाना इस प्रवास का प्रमुख उद्देश्य था। वे खजांची चौक स्थित श्याम सुंदर भार्गव की कोठी में ठहरे। गोल बाजार में उनकी सभा हुई, जिसमें स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार करीब 15 हजार लोग पहुंचे थे। ध्वनि विस्तारक यंत्र नहीं था, फिर भी बड़ी संख्या में लोग बापू का संदेश सुनने के लिए जुटे। उनके आह्वान का असर शहर के सामाजिक जीवन पर पड़ा। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज कोष में सहयोग की भावना मजबूत हुई। स्थानीय स्रोतों में नागरिकों द्वारा स्वराज कोष के लिए करीब 20 हजार रुपये दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

1933 में पांच दिन बना राष्ट्रीय गतिविधियों का केंद्र

दूसरी यात्रा 3 से 7 दिसंबर 1933 के बीच हुई। गांधीजी हरिजनोद्धार यात्रा के दौरान जबलपुर पहुंचे और ब्यौहार राजेंद्र सिंह के साठिया कुआं स्थित निवास पर ठहरे। उनका प्रमुख अभियान अस्पृश्यता के विरोध और हरिजन उत्थान का था। अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इसी दौरान नगरपालिका की ओर से उनका नागरिक अभिनंदन हुआ। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार कांग्रेस की गतिविधियों और प्रमुख नेताओं के आगमन के कारण इन दिनों जबलपुर राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र बना रहा। हरिजन कोष के लिए भी यहां बड़ी राशि एकत्रित की गई।

नर्मदा के धुआंधार तक पहुंचे बापू

27 फरवरी 1941 को गांधीजी तीसरी बार जबलपुर आए। इस बार उनका प्रवास अल्प था और भेड़ाघाट भ्रमण से जुड़ा रहा। कमला नेहरू अस्पताल, इलाहाबाद के उद्घाटन कार्यक्रम की यात्रा के दौरान वे जबलपुर पहुंचे और नर्मदा के संगमरमरी घाट तथा धुआंधार जलप्रपात का अवलोकन किया। गांधीजी की मध्यप्रदेश यात्राओं के उपलब्ध विवरणों में इस प्रवास का उल्लेख मिलता है।

अंतिम प्रवास में आजादी के निर्णायक दौर की आहट

27 अप्रैल 1942 को गांधीजी अंतिम बार जबलपुर आए। वे मदन महल स्थित पं. द्वारका प्रसाद मिश्र के निवास पर कुछ समय ठहरे। यह वह समय था जब क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद स्वतंत्रता आंदोलन निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा था। इसके कुछ ही महीने बाद 8 अगस्त 1942 को मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। राजघाट की आधिकारिक गांधी-कालक्रम सूची भी 1942 में क्रिप्स मिशन के बाद भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान को दर्ज करती है।

तिलवारा में पूरी हुई जबलपुर से जुड़ी अंतिम कड़ी

इतिहासकार आनंद सिंह राणा के अनुसार 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या के बाद उनकी अस्थियां देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाई गईं। 12 फरवरी को जबलपुर में तिलवारा घाट पर नर्मदा में उनके अस्थि-अवशेषों का विसर्जन हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे।

राष्ट्रीय सांस्कृतिक आडियो-विजुअल अभिलेखागार के अनुसार संरक्षित फिल्म में अनुयायियों और स्वतंत्रता सेनानियों की बड़ी भीड़ के साथ अस्थि-विसर्जन के दृश्य दर्ज हैं।

इस तरह जबलपुर गांधीजी के जीवनकाल की चार यात्राओं का साक्षी बनने के साथ उनकी अंतिम स्मृतियों का भी केंद्र बना। गोल बाजार की हुंकार से लेकर तिलवारा की नर्मदा तक बापू का जबलपुर से जुड़ा यह अध्याय स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार और जनचेतना-तीनों की कहानी एक साथ कहता है।