
दीप्ति मुले, जबलपुर। मिट्टी से आकार गढ़ने की कला अरुण प्रजापति के परिवार में केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही रचनात्मक विरासत है। दादा चमनलाल प्रजापति मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे, वहीं पिता सूरज प्रजापति मूर्तियां बनाने की कला से जुड़े हैं।
इसी माहौल में अरुण ने बचपन से मिट्टी, रंग और आकृतियों के बीच कला को करीब से समझा। अब वे पारंपरिक मूर्तिकला को आधुनिक तकनीक और फाइन आर्ट्स की शिक्षा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
अरुण प्रजापति ने कला निकेतन महाविद्यालय से बैचलर आफ फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की और इसके बाद मूर्तिकला में मास्टर डिग्री हासिल की।
पढ़ाई के दौरान उन्होंने फिगर स्कल्पचर, पोर्ट्रेट और विभिन्न प्रकार की मूर्तिकला की बारीकियों को सीखा। आज वे देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ रियलिस्टिक स्कल्पचर तैयार कर रहे हैं।
खासतौर पर दुर्गा जी की प्रतिमाओं में चेहरे के भाव, शारीरिक संरचना और बारीकियों को वास्तविक रूप देने पर उनका विशेष ध्यान रहता है।
अरुण का कहना है कि परिवार से मिली कला को समय के साथ आगे बढ़ाना जरूरी है। उनका प्रयास है कि पारंपरिक मूर्तिकला की पहचान बनी रहे, लेकिन उसमें आधुनिक कला की तकनीक और प्रयोग भी शामिल हों। वे गणेश जी की प्रतिमाएं बनाने के साथ ही फिगर स्कल्पचर और पोर्ट्रेट पर भी काम करते हैं। इसके अलावा म्यूरल बनाने का अनुभव भी उनके पास है।
मूर्तिकला में रियलिस्टिक काम को वे विशेष चुनौती के रूप में लेते हैं। किसी चेहरे के भाव, आंखों की बनावट, शरीर की संरचना और भाव-भंगिमा को हूबहू उकेरने के लिए धैर्य और बारीकी की जरूरत होती है। यही कारण है कि वे हर आकृति को तैयार करते समय उसके छोटे से छोटे विवरण पर काम करते हैं।
परिवार में कला की यह परंपरा अब नई पीढ़ी के हाथों नए रूप में आगे बढ़ रही है। दादा चमनलाल प्रजापति के मिट्टी के बर्तनों से शुरू हुई यह यात्रा पिता सूरज प्रजापति की मूर्तिकला तक पहुंची और अब अरुण इसे शैक्षणिक प्रशिक्षण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। अरुण के बड़ा भाई एडवोकेट हैं, लेकिन अरुण ने अपनी रुचि और पारिवारिक विरासत को ही अपना क्षेत्र बनाया।
अरुण का कहना है कि कला के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ सीखना और करना बाकी है। वे मेहनत के साथ मूर्तिकला में नए प्रयोग करना चाहते हैं और रियलिस्टिक स्कल्पचर, पोर्ट्रेट, म्यूरल तथा धार्मिक प्रतिमाओं के जरिए अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं। उनके लिए यह काम सिर्फ रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का माध्यम है।