
हेल्थ डेस्क, नई दिल्ली। एक जिंदगी बचाने के लिए कभी-कभी हर सेकंड की कीमत होती है। नोएडा में हाल ही में कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जब एक डोनर हार्ट को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए महज 20 किलोमीटर का रास्ता सिर्फ 16 मिनट में तय किया गया। इसके लिए गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर ट्रैफिक पुलिस ने मिलकर ग्रीन कॉरिडोर बनाया। इस तेज रफ्तार सफर के बाद फोर्टिस अस्पताल, नोएडा में मरीज का हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया।
इस पूरी कहानी की शुरुआत चंडीगढ़ में एक परिवार के बेहद मुश्किल फैसले से हुई। परिवार ने अपने दिवंगत सदस्य के अंगों को दान करने का फैसला लिया। इसी वजह से एक मरीज को नई जिंदगी मिलने की उम्मीद बनी।
डोनर हार्ट करीब रात 2 बजे हरियाणा के पंचकूला स्थित कमांड अस्पताल में उपलब्ध हुआ। नोएडा के फोर्टिस अस्पताल ने बिना समय गंवाए तीन टीमें एक साथ सक्रिय कर दीं।
एक टीम सड़क मार्ग से पंचकूला पहुंची और हार्ट को रिसीव किया। दूसरी तरफ नोएडा में डॉक्टरों की टीम मरीज को ट्रांसप्लांट के लिए तैयार करने लगी। वहीं तीसरी टीम ने हरियाणा, चंडीगढ़, गाजियाबाद और नोएडा के प्रशासन और ट्रैफिक अधिकारियों के साथ परिवहन की व्यवस्था शुरू कर दी।
हार्ट को पंचकूला से चंडीगढ़ एयरपोर्ट ले जाया गया। वहां से उसे विमान के जरिए गाजियाबाद के हिंडन एयरपोर्ट पहुंचाया गया।
सबसे चुनौतीपूर्ण सफर हिंडन एयरपोर्ट से फोर्टिस अस्पताल, नोएडा तक का था। सुबह करीब 7 बजे अस्पताल की प्रशासनिक टीम ने गाजियाबाद के डीसीपी ट्रैफिक अभय कुमार मिश्रा से संपर्क कर ग्रीन कॉरिडोर की जरूरत बताई।
इसके बाद पुलिस ने तुरंत रूट तैयार किया। गाजियाबाद वाले हिस्से की जिम्मेदारी इंस्पेक्टर अरुण कुमार को और नोएडा वाले हिस्से की जिम्मेदारी इंस्पेक्टर राजीव बालियान को दी गई। रूट के अहम स्थानों पर 100 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। गाजियाबाद कंट्रोल रूम से पूरे ऑपरेशन की निगरानी की गई और एंबुलेंस के साथ एक एस्कॉर्ट पुलिस वैन भी लगाई गई।
जैसे ही विमान हिंडन एयरपोर्ट पहुंचा, डोनर हार्ट को तुरंत इंतजार कर रही इमरजेंसी एंबुलेंस में शिफ्ट किया गया। इसके बाद ग्रीन कॉरिडोर के जरिए एंबुलेंस ने करीब 20 किलोमीटर की दूरी सिर्फ 16 मिनट में तय कर ली।
हार्ट ट्रांसप्लांट में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। शरीर से निकाले जाने के बाद डोनर हार्ट को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। अंग जितनी देर शरीर के बाहर रहता है, इस्केमिक इंजरी यानी रक्त और ऑक्सीजन की कमी से होने वाली क्षति का खतरा उतना बढ़ता है।
डोनर हार्ट के मामले में सामान्य तौर पर कुल कोल्ड इस्कीमिक टाइम को करीब दो घंटे के भीतर रखना बेहतर माना जाता है और इसे लगभग ढाई से तीन घंटे की स्वीकार्य सीमा से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।
इसी वजह से इस ऑपरेशन में डॉक्टरों ने इंतजार नहीं किया। जब हार्ट रास्ते में था, उसी समय नोएडा में मरीज को ट्रांसप्लांट के लिए तैयार किया जा रहा था।
इस मिशन में ट्रैफिक पुलिस के साथ एयरपोर्ट अथॉरिटी और सुरक्षा टीमों की भूमिका भी अहम रही। हिंडन एयरपोर्ट पर अस्पताल की टीम ने एयरपोर्ट सिक्योरिटी और संबंधित वायुसेना सुरक्षा अधिकारियों के साथ समन्वय कर एंबुलेंस को एयरस्ट्रिप के करीब खड़ा करने की विशेष अनुमति ली।
इससे विमान के उतरने और डोनर हार्ट को एंबुलेंस में रखने के बीच लगने वाला समय कम किया जा सका। बताया गया कि हिंडन एयरपोर्ट पर किसी जीवित डोनर ऑर्गन के परिवहन से जुड़ा यह पहला ऐसा अनुभव था।
ग्रीन कॉरिडोर किसी इमरजेंसी वाहन के लिए तैयार किया गया विशेष ट्रैफिक रूट होता है। इसमें ट्रैफिक पुलिस पहले से तय रास्ते के सिग्नल, चौराहों और यातायात को नियंत्रित करती है, ताकि एंबुलेंस को बार-बार रुकना न पड़े।
ऑर्गन ट्रांसप्लांट में इसकी अहमियत और बढ़ जाती है, क्योंकि डोनर ऑर्गन को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। ऐसे में सड़क पर बचाया गया हर मिनट मरीज के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
फोर्टिस अस्पताल, नोएडा के जोनल डायरेक्टर मोहित सिंह ने इस पूरे ऑपरेशन को कानून-व्यवस्था, एयरपोर्ट अथॉरिटी और अस्पताल की इमरजेंसी टीमों के बीच बेहतरीन तालमेल का उदाहरण बताया। उन्होंने डोनर के परिवार का भी आभार जताया, जिनके अंगदान के फैसले से मरीज के ट्रांसप्लांट का रास्ता खुला।
एक तरफ एक परिवार अपने सदस्य को खोने के दुख से गुजर रहा था, तो दूसरी तरफ उसी परिवार के फैसले ने किसी दूसरे परिवार के लिए जिंदगी की उम्मीद पैदा कर दी। और इस उम्मीद को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए 20 किलोमीटर का सफर महज 16 मिनट में पूरा किया गया।