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मिर्जापुर के हैंडलूम से कश्‍मीर का कानी वर्क, आंध्र कलमकारी, महाराष्‍ट्र की पैठणी, दक्षिण भारत की कांजीवरम साड़ी, कारीगरों ने बताया कैसे बनती है

असली जरी वाली साड़ी को तैयार करने में करीब एक महीने का समय लगता है। एक साड़ी के लिए एक कारीगर बुनाई करता है और दूसरा कढ़ाई का काम करता है। सिल्क, काटन...और पढ़ें

By Pooja GiteEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Fri, 25 Sep 2026 01:23:11 PM (IST)Updated Date: Fri, 25 Sep 2026 01:35:56 PM (IST)
मिर्जापुर के हैंडलूम से कश्‍मीर का कानी वर्क, आंध्र कलमकारी, महाराष्‍ट्र की पैठणी, दक्षिण भारत की कांजीवरम साड़ी, कारीगरों ने बताया कैसे बनती है
देश भर की मशहूर साडि़यां कैसे बनती हैं, यहां जानें।

HighLights

  1. इन परंपरागत साड़ियों को मशीन से नहीं, बल्कि करघे पर हाथों से तैयार किया जाता है।
  2. कीमत 1500 रुपये से शुरू होती है, सोने की जरी वाली साड़ियां दो लाख रुपये तक की हैं।
  3. हर साड़ी के पीछे अलग-अलग कारीगरों की लंबी मेहनत और पारंपरिक तकनीक जुड़ी है।

नईदुनिया प्रतिनिधि इंदौर। शहर में लगी साड़ी प्रदर्शनी में देश के अलग-अलग हिस्सों की बुनाई और पारंपरिक कारीगरी एक ही जगह देखने को मिल रही है। मिर्जापुर के हैंडलूम से लेकर कश्मीर का कानी वर्क, आंध्र प्रदेश की कलमकारी, महाराष्ट्र की पैठणी और दक्षिण भारत की कांजीवरम तक की साड़ियां यहां उपलब्ध हैं। खास बात यह है कि इन साड़ियों को मशीन से नहीं, बल्कि करघे पर हाथों से तैयार किया जाता है। इनकी कीमत जहां 1500 रुपये से शुरू होती है, वहीं सोने की जरी वाली साड़ियां दो लाख रुपये तक की हैं।

साड़ी के डिजाइन और बुनाई के हिसाब से इन्हें तैयार करने में कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक का समय लगता है। सामान्य हैंडलूम साड़ी 15 से 20 दिन में तैयार हो जाती है, जबकि कानी वर्क में 30 से 40 दिन और कांजीवरम की ब्राइडल साड़ी में पांच से छह महीने तक लग सकते हैं। कुछ विशेष कांजीवरम साड़ियों को तैयार करने में आठ महीने तक का समय भी लगता है। यानी प्रदर्शनी में दिख रही हर साड़ी के पीछे अलग-अलग कारीगरों की लंबी मेहनत और पारंपरिक तकनीक जुड़ी है।


मिर्जापुर की साड़ी में दो कारीगरों की मेहनत

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करघे पर साड़ी बुनने के बाद उसकी फिनिशिंग कराई जाती है। मिर्जापुर के वसीम आलम बताते हैं कि उनके यहां एक साड़ी तैयार करने में सामान्य तौर पर 15 से 20 दिन लगते हैं। असली जरी वाली साड़ी को तैयार करने में करीब एक महीने का समय लगता है। एक साड़ी के लिए एक कारीगर बुनाई करता है और दूसरा कढ़ाई का काम करता है। सिल्क, काटन, शहतूत, मूंगा सहित अलग-अलग धागों का इस्तेमाल किया जाता है। इन साड़ियों की कीमत 1500 रुपये से शुरू होकर डेढ़ लाख रुपये तक जाती है। तनछुई, पटोला, बंधेज और कड़वा कतान जैसी साड़ियों का खास चलन है।

कश्मीर की कानी और आंध्र की कलमकारी

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पुरानी पारंपरिक बुनाई अब नए डिजाइन के साथ लोगों को आकर्षित कर रही है। गोपाल चौधरी बताते हैं कि उनके स्टाल पर कर्नाटक के कूर्ग के साथ मूंगा सिल्क, वर्जन सिल्क, मोडल सिल्क, क्रेप सिल्क और महाराष्ट्र की पैठणी उपलब्ध है। कश्मीर की कानी वर्क वाली साड़ी को तैयार करने में करीब 30 से 40 दिन लगते हैं। वहीं आंध्र प्रदेश की कलमकारी साड़ी पर 25 से 30 दिन तक काम होता है और इसमें तीन कारीगर लगते हैं। यहां कई साड़ियां बाजार कीमत की तुलना में करीब 50 प्रतिशत कम कीमत पर दी जा रही है।

कांजीवरम की साड़ी में महीनों की बुनाई

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दक्षिण भारत की पारंपरिक कांजीवरम साड़ी की खासियत इसकी अलग-अलग हिस्सों में होने वाली बुनाई है। पल्लू और बार्डर तथा साड़ी की बाडी अलग तैयार कर बाद में उन्हें जोड़ा जाता है। सुमन कनौजिया के अनुसार उनके पास कांजीवरम के साथ उप्पडा और गढ़वाल साड़ियां भी हैं। वहीं विक्रेता के अनुसार प्योर जरी वाली ब्राइडल कांजीवरम साड़ी तैयार करने में पांच से छह महीने तक लगते हैं। कुछ विशेष साड़ियों में आठ महीने तक का समय लगता है। प्रदर्शनी में 1.80 लाख से दो लाख रुपये तक की कांजीवरम साड़ियां भी मिल रही हैं।

मधुबनी कला भी साड़ी पर

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बिहार से आए मोहम्मद गौस जमां खान के स्टाल पर हैंडलूम साड़ियों पर मधुबनी कला देखने को मिल रही है। उनके अनुसार साड़ी तैयार करने में करीब चार-पांच दिन लगते हैं और अधिकांश काम हाथ से होता है। मधुबनी के अलावा वारली और अन्य पारंपरिक प्रिंट भी प्रदर्शनी में शामिल हैं। इस तरह एक ही जगह पर अलग-अलग राज्यों की बुनाई, कला और कारीगरों की पारंपरिक तकनीक को साड़ियों के जरिए देखने का मौका मिल रहा है।