
लाइफस्टाइल डेस्क। बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव के कारण गांवों की प्राचीन लोक परंपराएं इतिहास के पन्नों में सिमटने लगी हैं। इसी क्रम में सिंगोड़ी की पहचान रही वर्षों पुरानी ''नारियल फेंक'' की अनूठी पारंपरिक प्रथा आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। कभी त्योहारों के अवसर पर ग्रामीणों के उत्साह और भाईचारे का प्रतीक रहने वाला यह आयोजन अब सिमटता नजर आ रहा है।
गांव के बुजुर्गों के अनुसार, नारियल फेंकने का यह आयोजन केवल मनोरंजन या खेल का जरिया नहीं था, बल्कि यह ग्रामीणों के आपसी मेल-जोल और सामूहिक सहभागिता को मजबूत करने वाली एक सांस्कृतिक धरोहर रहा है।
डिजिटल युग, मोबाइल संस्कृति और मनोरंजन के बदलते साधनों के कारण आज की युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक गतिविधियों से दूर होती जा रही है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि इस लोक विरासत को समय रहते नहीं सहेजा गया, तो आने वाली नस्लों के लिए यह परंपरा केवल किस्से-कहानियों तक ही सीमित रह जाएगी।
स्थानीय प्रबुद्धजनों और वरिष्ठ नागरिकों ने अपील की है कि गांव के बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं के उत्साह को मिलाकर इस पारंपरिक आयोजन को पुनः बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाए। यह प्रयास न केवल सिंगोड़ी की पुरानी पहचान को लौटाएगा, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी माटी, जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में सहायक सिद्ध होगा।
इस परंपरा को जीवित रखने में देवेंद्र वंदेवार, स्वर्गीय हेमंत चौरसिया, जग्गी पटेल रजोला, दीपक पटेल रजोला और पवन वंशकार सहित कई स्थानीय निवासियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिन्होंने हर वर्ष इस आयोजन को श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया।