
लाइफस्टाइल डेस्क। आज मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दो अलग-अलग राज्य हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि 1 नवंबर 2000 से पहले छत्तीसगढ़ भी मध्य प्रदेश का ही हिस्सा था? दोनों राज्यों की सीमाएं, प्रशासन और राजधानी अलग होने के पीछे सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं था। इसके पीछे क्षेत्रीय पहचान, विकास की असमानता, आदिवासी आबादी, प्राकृतिक संसाधनों और प्रशासनिक सुविधाओं से जुड़े कई सवाल थे।
छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने की मांग आजादी से पहले ही उठने लगी थी, लेकिन इसे हकीकत बनने में कई दशक लग गए। मध्य प्रदेश स्थापना दिवस के मौके पर समझिए कि आखिर दोनों राज्य अलग क्यों हुए और इस बंटवारे की प्रक्रिया कितनी लंबी थी।
छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने की मांग कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था। इसके शुरुआती संकेत 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में मिलने लगे थे। साल 1924 में वामनराव लाखे ने रायपुर जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक में अलग छत्तीसगढ़ का विचार उठाया था। इसके बाद अलग क्षेत्रीय पहचान की मांग समय-समय पर सामने आती रही।
आजादी के बाद 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने के बजाय मध्य प्रदेश में शामिल कर दिया गया। इसके बाद भी अलग राज्य की मांग खत्म नहीं हुई। छत्तीसगढ़ के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता इस क्षेत्र की अलग पहचान और विकास से जुड़े सवाल उठाते रहे।
1960 के दशक में खूबरचंद बघेल ने अलग छत्तीसगढ़ की मांग को संगठित रूप देने की कोशिश की। उन्होंने छत्तीसगढ़ भ्रातृ संघ के जरिए इस विचार को आगे बढ़ाया। बाद के वर्षों में भी अलग राज्य की मांग अलग-अलग संगठनों और राजनीतिक मंचों पर उठती रही।
1990 के दशक में इस मांग को राजनीतिक समर्थन मिलने लगा। साल 1993 में तत्कालीन मध्य प्रदेश विधानसभा ने छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। 1998 में केंद्र में अलग राज्य बनाने से जुड़ा विधेयक लोकसभा में पेश हुआ, लेकिन सरकार गिरने के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
आखिरकार 25 अगस्त 2000 को मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया। यानी अलग राज्य की मांग को औपचारिक रूप से उठाए जाने से लेकर राज्य बनने तक लगभग 76 साल का सफर रहा।
1. क्षेत्रीय पहचान और संस्कृति: छत्तीसगढ़ की अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान रही है। छत्तीसगढ़ी भाषा, लोकगीत, लोकनृत्य, त्योहार और आदिवासी परंपराएं इस क्षेत्र को मध्य प्रदेश के दूसरे हिस्सों से अलग पहचान देती थीं। स्थानीय लोगों के बीच अपनी क्षेत्रीय पहचान को प्रशासनिक स्तर पर भी मान्यता देने की मांग रही।
2. विकास और प्रशासनिक दूरी: उस समय मध्य प्रदेश भौगोलिक रूप से काफी बड़ा राज्य था। अलग-अलग क्षेत्रों तक प्रशासनिक सुविधाएं और सरकारी योजनाएं पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के लोगों के बीच यह भावना भी थी कि उनके इलाके की जरूरतों और विकास के मुद्दों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही। अलग राज्य बनने के समर्थकों का मानना था कि स्थानीय सरकार बनने से फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे।
3. आदिवासी आबादी और प्राकृतिक संसाधन: छत्तीसगढ़ के जंगल, खनिज और आदिवासी बहुल इलाके इस क्षेत्र की खास पहचान रहे हैं। यहां की बड़ी आबादी की आजीविका जंगल और स्थानीय संसाधनों से जुड़ी थी। अलग राज्य की मांग में इन संसाधनों के प्रबंधन और स्थानीय जरूरतों को प्राथमिकता देने का सवाल भी शामिल था। 2001 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की आबादी में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी 31.8 प्रतिशत थी।
दो राज्यों का बंटवारा सिर्फ नक्शे पर नई सीमा खींचने तक सीमित नहीं था। इसके लिए सरकारी विभागों, कर्मचारियों, संपत्तियों, बजट और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का बंटवारा भी करना पड़ा।