
लाइफस्टाइल डेस्क। पढ़ाई, करियर, नौकरी, रिश्ते और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच तनाव आज आम समस्या बनता जा रहा है। लंबे समय तक बना तनाव नींद, व्यवहार, कामकाज और रिश्तों को प्रभावित कर सकता है। कई बार यही स्थिति डिप्रेशन का रूप भी ले सकती है।
बुधवार को आयोजित नईदुनिया हेलो डाॅक्टर कार्यक्रम में शासकीय मेडिकल कॉलेज रतलाम के मनोरोग विभागाध्यक्ष डाॅ. कपिलदेव आर्य ने तनाव, नींद, पारिवारिक दबाव और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पाठकों के सवालों के जवाब दिए।
सवाल और उनके जवाब-
सवाल: नींद नहीं आने की समस्या कब चिंता का विषय है? — पुष्पा परमार, रतलाम
जवाब: कभी-कभार नींद प्रभावित होना सामान्य है, लेकिन यदि कई दिनों या हफ्तों तक लगातार नींद नहीं आए तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। तनाव, चिंता और डिप्रेशन में नींद कम या ज्यादा दोनों हो सकती है। सोने से पहले मोबाइल का अधिक उपयोग, चाय-काफी का ज्यादा सेवन और अनियमित दिनचर्या भी नींद प्रभावित करती है। रात में स्क्रीन का उपयोग कम करें और दिन में शारीरिक गतिविधि रखें। नींद की दवा स्वयं से नहीं लेना चाहिए। यदि परेशानी बनी रहे या उदासी, बेचैनी, थकान और नकारात्मक विचार भी आने लगें तो मनोरोग विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
सवाल: काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच तनाव कैसे कम करें? — सुरेश पाठक, रतलाम
जवाब: काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना तनाव कम करने में महत्वपूर्ण है। कार्यस्थल की परेशानियों को घर लाने से बचें और परिवार के साथ बातचीत के लिए समय निकालें। बच्चों के मोबाइल उपयोग को लेकर बार-बार विवाद करने के बजाय घर में पहले से स्पष्ट नियम तय करें। उनसे बातचीत करते समय डांटने के बजाय उनकी बात समझने की कोशिश करें। माता-पिता को भी अपने मोबाइल उपयोग में अनुशासन रखना चाहिए। चिड़चिड़ापन, बेचैनी या लगातार उदासी के कारण काम और रिश्ते प्रभावित होने लगें तो इसे केवल सामान्य दबाव मानकर नहीं टालना चाहिए।
सवाल: स्कूल में बच्चों के तनाव और डिप्रेशन को कैसे पहचानें? — सीमा गुर्जर, शिक्षिका, जावरा।
जवाब: बच्चों में मानसिक तनाव हमेशा उदासी के रूप में दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। शिक्षक बच्चे के व्यवहार में अचानक आए और लगातार बने रहने वाले बदलावों पर ध्यान दें। पढ़ाई में रुचि या प्रदर्शन कम होना, कक्षा में ध्यान नहीं लगना, दोस्तों से दूरी बनाना, खेल या पसंदीदा गतिविधियों से दूर होना, चिड़चिड़ापन या बार-बार रोना इसके संकेत हो सकते हैं। कुछ बच्चे सिरदर्द, पेट दर्द या थकान की शिकायत भी कर सकते हैं। ऐसे में बच्चे को सबके सामने डांटने या दूसरे बच्चों से तुलना करने के बजाय अकेले में सहजता से बात करें। बच्चा निराशा अथवा खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी बात करे तो माता-पिता को इसकी जानकारी देकर विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।