
लाइफस्टाइल डेस्क। आजकल सोशल मीडिया पर किसी की सोच से असहमति हो, किसी की विचारधारा कट्टर लगे या कोई नफरत भरी बातें करे, तो उसे तुरंत कोई न कोई लेबल दे दिया जाता है। कभी ‘दिमागी नक्सल’, कभी ‘Neo-Nazi’, कभी ‘Psychopath’ तो कभी ‘Sociopath’। इन शब्दों का इस्तेमाल राजनीतिक बहसों, इंटरनेट कमेंट्स और युवाओं के बीच होने वाली चर्चाओं में भी दिखाई देता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी की सोच कट्टर होने का मतलब है कि वह मानसिक रूप से बीमार है? क्या नफरत फैलाना किसी मनोवैज्ञानिक समस्या का संकेत है? और क्या Gen Z में ऐसे व्यवहार ज्यादा देखने को मिल रहे हैं, या सोशल मीडिया ने इन्हें ज्यादा दिखाई देने वाला बना दिया है?
इन सवालों को समझने के लिए अमेरिका के इलिनॉय में 19 वर्षीय अलेक्जेंड्रोस पापोराकिस से जुड़ा मामला एक उदाहरण पेश करता है। पुलिस ने उसे ऑरोरा इलाके के एक हिंदू मंदिर को निशाना बनाकर कथित सामूहिक गोलीबारी की योजना बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, उसके पास से हथियार और नस्लवादी विचारों वाला एक कथित घोषणापत्र मिला। अधिकारियों के अनुसार, उसके डिजिटल संदेशों में भारतीयों और अन्य समुदायों के खिलाफ नफरत तथा हिंसा की बातें थीं। मामले में उस पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनका कानूनी निर्धारण अदालत में होना है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पापोराकिस ने खुद को ‘Sociopathic White Supremacist Neo-Nazi’ बताया था। लेकिन किसी व्यक्ति का खुद को ‘सोशियोपैथ’ कहना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसे कोई मानसिक बीमारी है। यही वह बारीक अंतर है, जिसे समझना जरूरी है।
विचारधारा बताती है कि कोई व्यक्ति क्या मानता है, जबकि मानसिक बीमारी का निर्धारण उसके मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े लक्षणों और चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर होता है।
विचारधारा यानी Ideology किसी व्यक्ति के राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक विचारों, मान्यताओं और दुनिया को देखने के नजरिए से जुड़ी होती है। कोई व्यक्ति किसी विचारधारा को अपना सकता है, उससे असहमत हो सकता है या समय के साथ अपनी राय बदल सकता है।
इसके विपरीत, मानसिक बीमारी का संबंध सोचने, महसूस करने, व्यवहार करने या रोजमर्रा की जिंदगी में काम करने के तरीके में ऐसे बदलावों से हो सकता है, जिनका चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी हो।
दोनों के बीच अंतर समझने के लिए इन उदाहरणों पर गौर करें:
ये तीनों चीजें एक व्यक्ति में साथ मौजूद हो सकती हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा हमेशा हो। ब्रिटेन की Commission for Countering Extremism की 2025 की रिसर्च भी बताती है कि आतंकवाद और कट्टरपंथ को समझने के लिए विचारधारा अहम है, जबकि किसी व्यक्ति के कट्टरपंथी बनने की प्रक्रिया में व्यक्तिगत और सामाजिक परिस्थितियां भी भूमिका निभाती हैं।
सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की सोच या विचारों पर हमला करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह कोई मान्यता प्राप्त मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी निदान नहीं है।
इसी तरह, किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए मानसिक रूप से बीमार नहीं कहा जा सकता कि उसकी राजनीतिक राय अलग है, वह सरकार की आलोचना करता है या किसी विचारधारा का समर्थन करता है।
किसी विचार से असहमति और मानसिक बीमारी दो अलग बातें हैं। अगर कोई व्यक्ति हिंसा की धमकी देता है या किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है, तो उसके वास्तविक बयानों और व्यवहार का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। केवल राजनीतिक लेबल लगाना न तो उस व्यवहार को सही ढंग से समझाता है और न ही किसी मानसिक बीमारी की पुष्टि करता है।
Neo-Nazi ऐसी विचारधारा या आंदोलन से जुड़ा शब्द है, जो नाजी विचारों से प्रेरित होता है। White Supremacy का अर्थ है श्वेत लोगों को दूसरे नस्लीय समूहों से श्रेष्ठ मानने वाली विचारधारा।
इन विचारधाराओं में नस्लीय श्रेष्ठता, भेदभाव और कुछ मामलों में दूसरे समुदायों के खिलाफ हिंसा को उचित ठहराने वाली सोच शामिल हो सकती है।
यहां एक अहम बात समझनी जरूरी है- Neo-Nazi होना कोई मानसिक बीमारी का नाम नहीं है। यह एक वैचारिक पहचान है। किसी व्यक्ति के ऐसे विचारों को समझने के लिए उसके बयानों, गतिविधियों, सामाजिक नेटवर्क और उन मान्यताओं पर ध्यान देना होगा, जिन्हें वह स्वीकार करता है।
ब्रिटेन की सरकारी रिसर्च के मुताबिक, चरमपंथी विचारधारा लोगों को साझा शिकायतों, समूह की पहचान और किसी कथित दुश्मन के खिलाफ एकजुट होने का तर्क दे सकती है। हालांकि, हर व्यक्ति के कट्टरपंथ की ओर बढ़ने का रास्ता एक जैसा नहीं होता।
इंटरनेट पर ‘Sociopath’ और ‘Psychopath’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर ऐसे लोगों के लिए किया जाता है, जिन्हें बेरहम, स्वार्थी या दूसरों की भावनाओं की परवाह न करने वाला माना जाता है। लेकिन रोजमर्रा की भाषा में इन शब्दों का इस्तेमाल और क्लिनिकल साइकोलॉजी में किसी स्थिति का आकलन करना अलग-अलग बातें हैं।
‘Sociopathy’ और ‘Psychopathy’ आम बोलचाल तथा कुछ मनोवैज्ञानिक चर्चाओं में इस्तेमाल होने वाले शब्द हैं। ये अपने आप में DSM-5-TR में सूचीबद्ध स्वतंत्र मनोरोग निदान नहीं हैं।
किसी व्यक्ति की विचारधारा या मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान लगाने के बजाय उसके ठोस व्यवहार पर ध्यान देना ज्यादा उपयोगी है।
उदाहरण के लिए, किसी खास समुदाय के खिलाफ बार-बार हिंसा की धमकी देना, किसी हमले की योजना का जिक्र करना, हथियार जुटाना या हिंसा को अंजाम देने की तैयारी करना गंभीर चेतावनी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे संकेतों को केवल ‘मेंटल प्रॉब्लम’ कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने भी हिंसा की रोकथाम में स्पष्ट धमकियों और हिंसक गतिविधियों की तैयारी जैसे व्यवहारों पर ध्यान देने की अहमियत बताई है। हालांकि, कोई एक संकेत अपने आप यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति हमला करेगा।
पापोराकिस के मामले में जांच एजेंसियों ने कथित डिजिटल संदेशों, हथियारों और हिंसा से संबंधित दस्तावेजों को गंभीरता से लिया। इन आरोपों की कानूनी जांच जारी है। सार्वजनिक जानकारी के आधार पर उसके मानसिक स्वास्थ्य का निदान करना उचित नहीं होगा।
आज के दौर में किसी को ‘दिमागी नक्सल’, ‘सोशियोपैथ’ या ‘मेंटली इल’ कह देना आसान है। लेकिन किसी व्यक्ति को समझने के लिए शब्दों से आगे जाकर उसके विचारों, व्यवहार और परिस्थितियों को देखना जरूरी है। हर कट्टर विचार मानसिक बीमारी नहीं होता और हर मानसिक बीमारी हिंसा की वजह नहीं होती। असली चुनौती है नफरत और हिंसा को पहचानना, बिना मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों को गलत तरीके से कलंकित किए।