
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इंस्टाग्राम खोलते ही रिश्तों को लेकर तरह-तरह की सलाह वाली रील्स सामने आ जाती हैं। कहीं किसी व्यवहार को ‘रेड फ्लैग’ बताया जाता है तो कहीं पार्टनर को ‘टॉक्सिक’, ‘नार्सिसिस्ट’ या ‘गैसलाइटर’ कहने के संकेत गिनाए जाते हैं। कुछ सेकंड की इन रील्स को देखने के बाद कई लोग अपने ही रिश्ते को उसी नजरिए से देखने लगते हैं। वह सोचने लगते हैं कि कहीं उनका पार्टनर भी टॉक्सिक तो नहीं।
लेकिन क्या हर बहस, हर असहमति या पार्टनर की हर गलती वास्तव में ‘रेड फ्लैग’ होती है? स्पेशलिस्ट के मुताबिक सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले इन लेबल्स को रिश्ते की पूरी सच्चाई मान लेना सही नहीं है। किसी व्यवहार को समझने के लिए उसका कॉन्टेक्स्ट, बार-बार होने का पैटर्न और रिश्ते पर उसका असर देखना ज्यादा जरूरी है।
काउंसलर्स के मुताबिक इंस्टाग्राम ने रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई जरूरी बातों को आम बातचीत का हिस्सा बनाया है। सोशल मीडिया की वजह से लोगों को बाउंड्री सेट करना, इमोशनल एब्यूज, नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार और रिश्तों के खराब पैटर्न को पहचानने में मदद मिली है। पहले जिन व्यवहारों को लोग सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते थे, उनके बारे में अब लोग सवाल पूछने लगे हैं।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कुछ सेकंड की रील में एक आसान लेबल या ‘गोल्डन रूल’ में बदल दिया जाता है। यानी इंस्टाग्राम आपको किसी व्यवहार का नाम तो बता सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह आपके रिश्ते का पूरा संदर्भ भी समझा सके।
रिश्ते में दो लोगों के विचार अलग हो सकते हैं। बहस, नाराजगी या किसी बात पर असहमति होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि रिश्ता टॉक्सिक है। कई थेरेपिस्ट के मुताबिक- किसी एक घटना के बजाय यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि व्यवहार का पैटर्न कैसा है, वह कितनी बार दोहराया जाता है, उससे सामने वाले पर क्या असर पड़ता है और गलती होने के बाद व्यक्ति क्या करता है।
उदाहरण के लिए, किसी बहस में पार्टनर का गुस्सा हो जाना और बाद में अपनी गलती समझकर बात करना एक अलग स्थिति है। वहीं अगर कोई व्यक्ति बार-बार अपमान करता है, आपकी भावनाओं को लगातार नजरअंदाज करता है, नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार को सही ठहराता है और सुधार की कोशिश भी नहीं करता, तो इसे केवल ‘एक छोटी बहस’ कहकर नजरअंदाज करना भी सही नहीं होगा।
सोशल मीडिया पर ‘टॉक्सिक’, ‘गैसलाइटिंग’ और ‘नार्सिसिस्ट’ जैसे शब्द बहुत तेजी से इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति को सिर्फ एक व्यवहार देखकर इनमें से कोई लेबल दे देना सही तरीका नहीं है।
स्पेशलिस्ट कहते हैं- इंस्टाग्राम चीजों को अक्सर ब्लैक एंड व्हाइट तरीके से पेश करता है। यानी किसी व्यवहार को या तो सही माना जाता है या गलत। इससे लोगों में भी रिश्तों को लेकर बाइनरी सोच विकसित हो सकती है और वे जल्द निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं। वास्तविक थेरेपी में तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल होती है।
थेरेपी के दौरान किसी एक घटना के आधार पर व्यक्ति या रिश्ते को जज नहीं किया जाता। व्यवहार का संदर्भ, उसकी नियमितता, उसका पैटर्न और उसका परिणाम देखा जाता है।
मसलन, सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि ‘क्या पार्टनर ने गलत व्यवहार किया?’ बल्कि यह भी देखा जाता है-
यही वजह है कि कुछ सेकंड की सोशल मीडिया क्लिप किसी व्यक्ति या पूरे रिश्ते की मनोवैज्ञानिक तस्वीर नहीं बता सकती।
अगर कोई इंस्टाग्राम रील देखने के बाद आपको अपने रिश्ते पर शक होने लगे तो तुरंत कोई लेबल लगाने के बजाय कुछ चीजों पर ध्यान दें।