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नवाबों के शहर भोपाल की दिलचस्‍प कहानियां, कौन थी कल्लो बुआ जिन्‍होंने सूपड़ा भर अशरफियां मस्जिद के लिए दी थीं

Interesting stories from Bhopal: ऐसी ही एक कहानी कल्लो बुआ की है। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जमा पूंजी में से सूपड़ा भर अशरफियां मस्जिद बनाने के लिए...और पढ़ें

By Abrar KhanEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Sat, 22 Aug 2026 12:55:23 PM (IST)Updated Date: Sat, 22 Aug 2026 01:05:35 PM (IST)
नवाबों के शहर भोपाल की दिलचस्‍प कहानियां, कौन थी कल्लो बुआ जिन्‍होंने सूपड़ा भर अशरफियां मस्जिद के लिए दी थीं
भोपाल की रोचक कहानियां।

HighLights

  1. अनीस के मुताबिक उनकी दादी का रंग काफी सांवला था।
  2. इसलिए गली-मोहल्‍ले के लोग उन्हें प्यार से कल्लो कहने लगे।
  3. सम्मान के तौर पर उनके नाम के साथ बुआ लगाया जाने लगा

मोहम्मद अबरार खान, नवदुनिया। भोपाल को नवाबों और बेगमों का शहर कहा जाता है, लेकिन यहां की पुरानी और तंग गलियों में आम लोगों की भी कई ऐसी कहानियां छिपी हैं, जो आज भी शहर के इतिहास का हिस्सा हैं। इन गलियों में मजदूर वर्ग की कई महिलाओं ने अपनी मेहनत और कमाई से समाज के लिए ऐसे काम किए, जिन्हें आज भी याद किया जाता है।

ऐसी ही एक कहानी कल्लो बुआ की है। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जमा पूंजी में से सूपड़ा भर अशरफियां मस्जिद बनाने के लिए दे दी थीं। खास बात यह है कि उनके परिवार के पास कोई बड़ी दौलत नहीं थी। उनके पति जमादार का काम करते थे, लेकिन कल्लो बुआ ने अपनी मेहनत से जो कुछ बचाया, उसे नेक काम में लगा दिया।


क्‍या है कल्‍लो बुआ की दास्‍तान

बाणगंगा झुग्गी बस्ती निवासी 65 वर्षीय मोहम्मद अनीस, जो कल्लो बुआ की तीसरी पीढ़ी से हैं, बताते हैं कि यह करीब सौ साल से भी पुरानी बात है। उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन अपने बुजुर्गों और मस्जिद कमेटी से जुड़े लोगों से उन्होंने सुना है कि उनकी दादी, जिन्हें लोग कल्लो बुआ के नाम से जानते थे, ने मस्जिद बनाने के लिए अपनी जगह के साथ सूपड़ा भर अशरफियां भी दी थीं। अनीस बताते हैं कि उनके दादा कोई अमीर आदमी नहीं थे। वे जमादारी का काम करते थे और परिवार के लिए बड़ी जायदाद भी नहीं छोड़ गए। उस समय उनका घर मस्जिद के पीछे ही हुआ करता था।

नाम भी कहानी बन गया

अनीस के मुताबिक उनकी दादी का रंग काफी सांवला था, इसलिए लोग उन्हें प्यार से कल्लो कहने लगे। बाद में सम्मान के तौर पर उनके नाम के साथ बुआ लगाया जाने लगा और धीरे-धीरे वे पूरे इलाके में कल्लो बुआ के नाम से मशहूर हो गईं। आज उसी नाम से गली और मस्जिद भी जानी जाती है।

गुलिया दाई और काली धोबन जैसी महिलाओं की कहानियां

  • कल्लो बुआ की कहानी अकेली नहीं है। हाता रुस्तम खां निवासी रशीद अहमद बाते हैं कि भोपाल की पुरानी गलियों में गुलिया दाई और काली धोबन जैसी महिलाओं की कहानियां भी सुनने को मिलती हैं।
  • गुलिया दाई ने कई अमीरजादों की डिलीवरी कराई, काली धोबन कई रईस परिवारों के कपड़े धोया करती थीं।
  • इन महिलाओं ने भले ही कभी अपने नाम को मशहूर करने की कोशिश नहीं की, लेकिन उनकी मेहनत और योगदान ने उन्हें शहर की यादों में जिंदा रखा।
  • इनके नाम की गलिया आज भी बहुत मशहूर हैं जबकि इन गलियों में कई नामचीन हस्तियां रहती हैं।
  • रशीद कहते हैं कि उस दौर में लोग अपने नाम की चर्चा से ज्यादा नेक काम को अहमियत देते थे।
  • मजदूर और गरीब परिवारों की कई महिलाओं ने एक-एक पैसा जोड़कर बचाया और मस्जिदों व दूसरे अच्छे कामों में दे दिया।
  • चमेली वाली मस्जिद और अरीठे वाली मस्जिद से जुड़ी ऐसी कई लोककथाएं आज भी पुरानी पीढ़ी के बीच सुनाई जाती हैं।

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आज भी परिवार निभा रहा है परंपरा

कल्लो बुआ की अगली पीढ़ी भी मस्जिदों से जुड़ी हुई है। अनीस बाणगंगा की झुग्गी बस्ती में रहते हैं और वहां उनकी पत्नी एक छोटी किराने की दुकान चलाती हैं। अनीस सुबह उठकर मांजी साहिबा मस्जिद, अखाड़े वाली मस्जिद और मकबरे वाली मस्जिद की सफाई करने जाते हैं। मस्जिदों से मिलने वाली रकम से ही उनके परिवार का खर्च चलता है। आज भले ही बहुत कुछ बदल गया हो, लेकिन कल्लो बुआ की कहानी आज भी यह बताती है कि शहर की विरासत सिर्फ महलों और नवाबों की नहीं, बल्कि उन आम लोगों की भी है जिन्होंने अपनी छोटी-छोटी बचत और मेहनत से समाज के लिए बड़े काम किए।