
मोहम्मद अबरार खान, नवदुनिया। भोपाल को नवाबों और बेगमों का शहर कहा जाता है, लेकिन यहां की पुरानी और तंग गलियों में आम लोगों की भी कई ऐसी कहानियां छिपी हैं, जो आज भी शहर के इतिहास का हिस्सा हैं। इन गलियों में मजदूर वर्ग की कई महिलाओं ने अपनी मेहनत और कमाई से समाज के लिए ऐसे काम किए, जिन्हें आज भी याद किया जाता है।
ऐसी ही एक कहानी कल्लो बुआ की है। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जमा पूंजी में से सूपड़ा भर अशरफियां मस्जिद बनाने के लिए दे दी थीं। खास बात यह है कि उनके परिवार के पास कोई बड़ी दौलत नहीं थी। उनके पति जमादार का काम करते थे, लेकिन कल्लो बुआ ने अपनी मेहनत से जो कुछ बचाया, उसे नेक काम में लगा दिया।
बाणगंगा झुग्गी बस्ती निवासी 65 वर्षीय मोहम्मद अनीस, जो कल्लो बुआ की तीसरी पीढ़ी से हैं, बताते हैं कि यह करीब सौ साल से भी पुरानी बात है। उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन अपने बुजुर्गों और मस्जिद कमेटी से जुड़े लोगों से उन्होंने सुना है कि उनकी दादी, जिन्हें लोग कल्लो बुआ के नाम से जानते थे, ने मस्जिद बनाने के लिए अपनी जगह के साथ सूपड़ा भर अशरफियां भी दी थीं। अनीस बताते हैं कि उनके दादा कोई अमीर आदमी नहीं थे। वे जमादारी का काम करते थे और परिवार के लिए बड़ी जायदाद भी नहीं छोड़ गए। उस समय उनका घर मस्जिद के पीछे ही हुआ करता था।
अनीस के मुताबिक उनकी दादी का रंग काफी सांवला था, इसलिए लोग उन्हें प्यार से कल्लो कहने लगे। बाद में सम्मान के तौर पर उनके नाम के साथ बुआ लगाया जाने लगा और धीरे-धीरे वे पूरे इलाके में कल्लो बुआ के नाम से मशहूर हो गईं। आज उसी नाम से गली और मस्जिद भी जानी जाती है।
कल्लो बुआ की अगली पीढ़ी भी मस्जिदों से जुड़ी हुई है। अनीस बाणगंगा की झुग्गी बस्ती में रहते हैं और वहां उनकी पत्नी एक छोटी किराने की दुकान चलाती हैं। अनीस सुबह उठकर मांजी साहिबा मस्जिद, अखाड़े वाली मस्जिद और मकबरे वाली मस्जिद की सफाई करने जाते हैं। मस्जिदों से मिलने वाली रकम से ही उनके परिवार का खर्च चलता है। आज भले ही बहुत कुछ बदल गया हो, लेकिन कल्लो बुआ की कहानी आज भी यह बताती है कि शहर की विरासत सिर्फ महलों और नवाबों की नहीं, बल्कि उन आम लोगों की भी है जिन्होंने अपनी छोटी-छोटी बचत और मेहनत से समाज के लिए बड़े काम किए।