
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। सावन आते ही जबलपुर थोड़ा और अपना-सा लगने लगता है। बारिश की बूंदों से धुली सड़कें, हर तरफ गूंजता हर-हर महादेव, नर्मदा किनारे की शाम और हाथ में मोबाइल लिए सेल्फी बनाती नई पीढ़ी, यहां सावन सिर्फ एक धार्मिक महीना नहीं, बल्कि शहर की अपनी यूथ वाइब है।
हम जबलपुरिया सावन को सिर्फ मनाते नहीं, उसे जीते हैं। मंदिर की घंटी हो या बारिश में भीगती बाइक राइड, कांवड़ की धुन हो या दोस्तों के साथ चाय की चुस्की, हर तस्वीर में अपना जबलपुर नजर आता है।
मैंने हमेशा महसूस किया है कि सावन में जबलपुर की फीलिंग बदल जाती है। गर्मी की थकान के बाद बारिश आती है और शहर जैसे सांस लेने लगता है। पेड़ों का रंग गहरा हो जाता है। सड़कों के किनारे हरियाली दिखने लगती है। हवा में मिट्टी की खुशबू होती है और कानों में कहीं न कहीं से भोले के भजन सुनाई देते रहते हैं।
सुबह मंदिर में जल चढ़ाया, दोपहर में कालेज या आफिस, शाम को दोस्तों के साथ घूमना और रात में इंटरनेट मीडिया पर सावन की रील, जबलपुर का यूथ अपने तरीके से सावन सेलिब्रेट करता है।
कभी दोस्तों के साथ बैठकर घंटों बातें करना, कभी चुपचाप नदी को देखते रहना। कोई फोटो क्लिक कर रहा है, कोई रील बना रहा है, कोई बस बारिश और नदी का वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है।
इस सबके बीच एक बात कामन है, नर्मदा के सामने पहुंचकर हम थोड़े शांत हो जाते हैं। शायद यही जबलपुर की खूबसूरती है। यहां आधुनिकता के बीच भी प्रकृति और आस्था अपना रास्ता बना लेती है।
सावन में शिव मंदिरों की तरफ जाते युवाओं की संख्या देखते ही बनती है। कोई बाइक से पहुंच रहा है, कोई पैदल। किसी के हाथ में फूल हैं तो किसी के हाथ में मोबाइल।
कपड़ों में मॉडर्न स्टाइल है, लेकिन माथे पर चंदन या त्रिपुंड भी दिख जाता है। हमारी पीढ़ी को लेकर अक्सर कहा जाता है कि युवा परंपराओं से दूर हो रहे हैं। लेकिन जब सावन आता है तो यह धारणा थोड़ी कमजोर पड़ती दिखती है।
हम शायद पूजा करने का तरीका बदल रहे हैं, लेकिन जुड़ाव खत्म नहीं हुआ है। हम मंदिर की फोटो इंस्टाग्राम पर डाल सकते हैं, ‘हर हर महादेव’ की स्टोरी लगा सकते हैं, लेकिन उसके पीछे भाव बिल्कुल असली हो सकता है।
सावन में जबलपुर की आउटिंग की बात हो और भेड़ाघाट याद न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। बारिश में संगमरमरी चट्टानों का रंग, धुआंधार की आवाज और आसपास का हरियापन-सब कुछ जैसे किसी फिल्म का सीन लगता है।
युवाओं के लिए यह सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं, दोस्तों के साथ यादें बनाने की जगह भी है। कभी अचानक प्लान बनता है-चल भेड़ाघाट चलते हैं। फिर दो-तीन बाइक निकलती हैं, बारिश शुरू होती है, रास्ते में चाय मिलती है और मंजिल से ज्यादा मजा सफर में आने लगता है।
सावन हमें थोड़ा रुकना भी सिखाता है आज की जिंदगी तेज है। कालेज, नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाएं, करियर, सोशल मीडिया—हर कोई भाग रहा है, लेकिन सावन जैसे कहता है-थोड़ा रुक भी जाओ। बारिश देखो। नर्मदा देखो। मंदिर की घंटी सुनो। दोस्तों के साथ बिना किसी खास वजह के बैठो। शायद जिंदगी की सबसे अच्छी चीजें वही होती हैं, जिनका कोई शेड्यूल नहीं होता।
हम नई पीढ़ी के लोग हैं। हमें ट्रेंड भी पसंद हैं और परंपराएं भी। हमें कैफे भी पसंद हैं और मंदिर की चाय भी। हमें रील भी बनानी है और नर्मदा किनारे कुछ देर चुप भी बैठना है।
और शायद यही हमारा सावन भी-थोड़ी भक्ति, थोड़ी बारिश, थोड़ी मस्ती और ढेर सारा अपनापन। क्योंकि अपन जबलपुरिया हैं साहब… सावन आए तो भोले भी अपने लगते हैं और पूरा शहर भी।
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