
लाइफस्टाइल डेस्क। करवा चौथ पर सुहागिनें सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत रखती हैं। दूसरी ओर, आज की पीढ़ी इंटरमिटेंट फास्टिंग (IF) यानी तय घंटों तक भूखे रहकर बाकी समय खाने के तरीके को सेहत का नया मंत्र मान रही है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों के पीछे की सोच बहुत मिलती-जुलती है, और आयुर्वेद इन्हें जोड़ने वाली कड़ी है।
आयुर्वेद उपवास को लंघन कहता है, यानी शरीर को हल्का करने की प्रक्रिया। इसका उद्देश्य अग्नि (पाचन शक्ति) को प्रबल करना और आम (अपच से जमा विषैले तत्व) को बाहर निकालना है। आयुर्वेद का नियम है कि अगला भोजन तभी करें जब पिछला पूरी तरह पच चुका हो, जिसमें सामान्यतः 4 से 6 घंटे लगते हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि उपवास हर किसी के लिए एक जैसा नहीं होता। यह व्यक्ति की प्रकृति, उम्र, ताक़त और मौसम पर निर्भर करता है।
इंटरमिटेंट फास्टिंग में 16:8 (16 घंटे उपवास, 8 घंटे भोजन) या 5:2 जैसे तय फ़ॉर्मूले होते हैं। आधुनिक शोध इसे चयापचय को आराम देने और शरीर की सफ़ाई प्रक्रिया से जोड़ते हैं। आयुर्वेद भी रात का भोजन सूर्यास्त के आसपास और हल्का करने की सलाह देता है, जिससे लगभग 12 से 14 घंटे का प्राकृतिक रात्रिकालीन उपवास हो जाता है।
फ़र्क़ यह है कि IF का नियम सब पर एक-सा लागू होता है, जबकि आयुर्वेद व्यक्ति की प्रकृति देखता है। कफ प्रकृति के लोग लंबा उपवास आसानी से सह लेते हैं। पित्त प्रकृति वालों के लिए 12 से 14 घंटे का अंतर पर्याप्त है, क्योंकि ज़्यादा भूखे रहने से एसिडिटी, चिड़चिड़ापन और सिरदर्द बढ़ सकता है। वात प्रकृति वालों को सख़्त उपवास से बचना चाहिए, वरना कमज़ोरी, बेचैनी और नींद की समस्या हो सकती है।
एक और अहम अंतर भोजन के समय का है। आयुर्वेद के अनुसार दिन का सबसे भारी भोजन दोपहर (10 से 2 बजे) में करना चाहिए, जब अग्नि सबसे तेज़ होती है। कई IF अपनाने वाले दोपहर तक भूखे रहकर रात को भारी खाना खाते हैं, जो आयुर्वेद की दृष्टि से उचित नहीं माना जाता।
करवा चौथ कार्तिक मास में आता है, यानी शरद ऋतु में। आयुर्वेद के अनुसार इस मौसम में शरीर में पित्त स्वाभाविक रूप से बढ़ा होता है। ऐसे में पूरे दिन निर्जला रहने पर पित्त प्रधान लोगों को एसिडिटी, सिरदर्द, चक्कर और कमज़ोरी हो सकती है।
व्रत की अवधि लगभग 14 से 16 घंटे होती है, जो IF के 16:8 जैसी ही है। इसलिए व्रत से पहले और बाद का खानपान सबसे ज़्यादा मायने रखता है।
सरगी में क्या लें: सूर्योदय से पहले की सरगी हल्की और पौष्टिक हो। फल, मेवे, नारियल पानी, दूध-दलिया या अंकुरित अनाज अच्छे विकल्प हैं। बहुत तली-भुनी चीज़ें, भारी मिठाइयां और ज़्यादा चाय-कॉफ़ी से बचें, क्योंकि ये दिन भर प्यास और एसिडिटी बढ़ाती हैं। भोजन धीरे-धीरे और शांत मन से करें।
व्रत दिन में: बार-बार धूप में निकलने और अधिक परिश्रम से बचें। आराम करें और मन को शांत रखें।
व्रत कैसे खोलें: चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद सीधे भारी पकवानों पर न टूट पड़ें। पहले पानी या नारियल पानी लें, फिर खजूर या कोई फल खाएँ। कुछ देर बाद दाल-चावल, खिचड़ी या रोटी-सब्ज़ी जैसा हल्का भोजन करें। आयुर्वेद के अनुसार व्रत तोड़ना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना व्रत रखना, क्योंकि कमज़ोर पड़ी अग्नि पर अचानक बोझ डालने से गैस, अपच और एसिडिटी हो सकती है।
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, एसिडिटी या हृदय रोग के मरीज़, कमज़ोर या कम वज़न वाले लोग और नियमित दवा लेने वालों को निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर या योग्य आयुर्वेदाचार्य की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। ज़रूरत पड़ने पर जल या फलाहार के साथ व्रत रखा जा सकता है। श्रद्धा में कोई कमी नहीं आती, स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही ज़रूरी है।
पंचकर्म विशेषज्ञ डॉ. भावना पालीवाल B.A.M.S. का कहना है कि आयुर्वेद, इंटरमिटेंट फास्टिंग और करवा चौथ तीनों का मूल संदेश एक है: पाचन को विश्राम दें और भोजन में संयम रखें। परंपरा की श्रद्धा में थोड़ी वैज्ञानिक समझ जोड़ ली जाए, तो व्रत शरीर पर बोझ नहीं, बल्कि सेहत का वरदान बन सकता है।