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स्क्रीन टाइम घटाने बच्चे भर रहे प्रॉमिस कार्ड, परिवार भी ले रहे 30 दिन की चुनौती

चुनौती के पहले दिन परिवार अपने स्क्रीन टाइम, भोजन के दौरान मोबाइल के इस्तेमाल, सोने के समय और अपने मूड का आकलन करेगा। इसके बाद चार प्रमुख नियम अपनाने ...और पढ़ें

By Daksha VaidkarEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Tue, 29 Sep 2026 11:27:48 AM (IST)Updated Date: Tue, 29 Sep 2026 11:33:11 AM (IST)
स्क्रीन टाइम घटाने बच्चे भर रहे प्रॉमिस कार्ड, परिवार भी ले रहे 30 दिन की चुनौती
स्‍क्रीन टाइम।

HighLights

  1. लंबे समय तक स्क्रीन देखने का असर केवल आंखों तक सीमित नहीं है
  2. स्क्रीन इस्तेमाल से थकान, गर्दन, पीठ में दर्द की परेशानी हो सकती है।
  3. और लंबे समय तक बैठे रहने से शारीरिक सक्रियता भी कम होती है।

दक्षा वैदकर, भोपाल। “मैं अपनी आंखों की देखभाल के लिए धूप में बाहर खेलूंगा/खेलूंगी, अपने दिमाग को आराम दूंगा/दूंगी, मोबाइल फोन का कम इस्तेमाल करूंगा/करूंगी और बिना स्क्रीन देखे खाना खाऊंगा/खाऊंगी। सोने से पहले एक घंटे तक स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं करूंगा/करूंगी, ताकि मजबूत बन सकूं और अपने सपने को पूरा कर सकूं।” शहर के कई स्कूलों में इन दिनों बच्चे इस तरह का प्रोमिस कार्ड भरकर डिजिटल उपकरणों के संतुलित इस्तेमाल का संकल्प ले रहे हैं। कार्ड में बच्चे अपने भविष्य के सपने के बारे में भी लिख रहे हैं।

स्कूलों में बच्चों की डिजिटल आदतों को संतुलित करने के लिए संस्था वननेस और ब्रेन इनफिनिटी की ओर से ‘रेजिंग हेल्दी माइंड्स इन ए डिजिटल एज’ पहल शुरू की गई है। इसके तहत स्कूलों में बच्चों के संवाद सत्र, शिक्षकों के प्रशिक्षण और अभिभावकों की कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। संस्था के विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की स्क्रीन संबंधी आदतों में बदलाव के लिए केवल बच्चों को समझाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अभिभावकों और शिक्षकों को भी साथ लेकर काम करना जरूरी है।


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30 दिन की डिजिटल बैलेंस चुनौती

मोबाइल, टैबलेट और अन्य डिजिटल उपकरण पढ़ाई और मनोरंजन का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर करने के बजाय उसके संतुलित इस्तेमाल की आदत विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। पहल के तहत अभिभावकों को ‘30-डे फैमिली डिजिटल बैलेंस चैलेंज’ लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

चुनौती के पहले दिन परिवार अपने स्क्रीन टाइम, भोजन के दौरान मोबाइल के इस्तेमाल, सोने के समय और अपने मूड का आकलन करेगा। इसके बाद चार प्रमुख नियम अपनाने होंगे- भोजन के दौरान स्क्रीन नहीं, सोने से 60 मिनट पहले स्क्रीन बंद, रोज 20 मिनट परिवार के साथ समय और प्रतिदिन आउटडोर गतिविधि।

30 दिनों के दौरान स्क्रीन-फ्री डिनर, प्रकृति के बीच समय बिताने, पहेली और खेल जैसी गतिविधियों को शामिल करने का सुझाव दिया जा रहा है। कुछ दिन परिवार पूरी तरह तकनीक-मुक्त भी रख सकता है। 31वें दिन शुरुआत और कार्यक्रम के बाद स्क्रीन टाइम, नींद और मूड में आए बदलाव का आकलन किया जाएगा।

आंखों के साथ नींद और एकाग्रता पर भी असर

कार्यक्रम में बच्चों को बताया जा रहा है कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने का असर केवल आंखों तक सीमित नहीं है। लगातार स्क्रीन इस्तेमाल से आंखों में थकान, गर्दन और पीठ में दर्द जैसी परेशानी हो सकती है। लंबे समय तक बैठे रहने से शारीरिक सक्रियता भी कम होती है। वहीं, लगातार डिजिटल उत्तेजना का असर एकाग्रता और शांत होकर सोचने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।

बच्चों को स्क्रीन इस्तेमाल के दौरान 20-20-20 नियम भी समझाया जा रहा है। इसके अनुसार हर 20 मिनट में करीब 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखना चाहिए। इसके साथ ही आउटडोर खेल और शारीरिक गतिविधियों को रोजमर्रा की दिनचर्या में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।

सोने और भोजन के समय स्क्रीन से दूरी

अभिभावकों को सोने से कम से कम एक घंटे पहले बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। भोजन के दौरान मोबाइल या टीवी देखने से बच्चे खाने पर ध्यान कम दे सकते हैं, इसलिए परिवार को भोजन के समय स्क्रीन-मुक्त माहौल रखने की सलाह दी जा रही है।

कहानी और गीत से समझा रहे डिजिटल आदतों का असर

बच्चों को डिजिटल संतुलन समझाने के लिए प्रोमिस कार्ड में दो क्यूआर कोड दिए गए हैं। एक कोड से ‘हेल्दी आइज सॉन्ग’ और दूसरे से ‘बंटी बनी’ कहानी देखी जा सकती है। कहानी में मोबाइल के अधिक इस्तेमाल के कारण बंटी की आंखों में परेशानी, पढ़ाई में गिरावट और खेल में प्रदर्शन प्रभावित होने की स्थिति दिखाई गई है। इसके बाद वह स्क्रीन टाइम कम करने, समय पर सोने और नियमित खेलने जैसी आदतें अपनाता है।

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2016 में काउंसलिंग से शुरू हुआ सफर

हमारी संस्था की शुरुआत 2016 में वन नेस सेंटर फोर रिसर्च एंड प्रैक्टिस इन साइको-स्पिरिचुअलिटी के रूप में हुई थी। यहां किशोरों, विद्यार्थियों, करियर, दांपत्य और अभिभावकों से जुड़े मामलों में परामर्श, मनोवैज्ञानिक आकलन और विभिन्न उपचार पद्धतियों पर काम किया जाता था। अब संस्था ने काम का दायरा बढ़ाते हुए ‘ब्रेन इनफिनिटी’ को डिजिटल स्वास्थ्य जागरूकता की पहल के रूप में विकसित किया है। यह पहल पं. प्रदीप कुमार शर्मा, संस्थापक वन नेस हीलिंग टच के नेतृत्व में की जा रही है। इसमें स्कूल कार्यशालाओं, शिक्षक प्रशिक्षण, अभिभावक परामर्श और क्लिनिकल सहयोग को एक साथ जोड़ा गया है।

- रितुराज शर्मा, सह-संस्थापक वननेस और ब्रेन इनफिनिटी एवं परामर्श मनोवैज्ञानिक

हमारे स्कूल के क्लास 1 से लेकर क्लास 7 तक बच्चों ने इस प्रोग्राम में भाग लिया और स्क्रीन टाइम कम करने की प्रतिज्ञा ली। वर्तमान समय की यह सबसे बड़ी समस्या है कि बच्चे स्क्रीन के बिना कोई काम नहीं करते। उनका खेलना-कूदना लगभग खत्म हो गया है। इस समस्या का इलाज तभी होगा जब पेरेंट्स और टीचर मिलकर काम करेंगे। यह पहल सभी को एक प्लेटफार्म पर लाती है और सिखाती है कि बच्चों की मोबाइल

देखने की आदत कैसे छुड़वाएं। - डी. अशोक कुमार, प्राचार्य, वैष्णवी पब्लिक स्कूल