डिजिटल डेस्क। कृष्ण जन्माष्टमी, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व (Krishna Janmashtami 2025), पूरे देश में बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। जहां ज्यादातर हिंदू त्योहार सुबह या दिन में अपने चरम पर होते हैं, वहीं जन्माष्टमी का सबसे पवित्र क्षण आधी रात को आता है।
यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं, आध्यात्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय महत्व से जुड़ा हुआ है। आइए जानते हैं, आखिर क्यों श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव रात 12 बजे मनाया जाता है।
भागवत पुराण के अनुसार, भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात के समय मथुरा में हुआ था। उनके माता-पिता, देवकी और वसुदेव, मथुरा के राजा कंस की कैद में थे। कंस को यह भविष्यवाणी मिली थी कि देवकी का आठवां पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। इस भय से उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके पहले सात बच्चों की हत्या कर दी।
जब आठवां पुत्र कृष्ण पैदा हुए, तो वसुदेव ने उन्हें टोकरी में रखकर यमुना नदी पार की और गोकुल पहुंचा दिया। वहां नंद और यशोदा ने उन्हें पाला। आधी रात को हुआ उनका जन्म अंधकार के बीच प्रकाश और आशा के आगमन का प्रतीक माना जाता है - जैसे सबसे गहरे संकट में भी उम्मीद का जन्म होता है।
इसका आध्यात्मिक महत्व आत्मा के जागरण का समय का माना जाता है। आधी रात गहन शांति और स्थिरता का समय मानी जाती है। इस समय ग्रह-नक्षत्र की स्थिति ध्यान और साधना के लिए अनुकूल मानी जाती है। इसके अलावा, रात का यह समय ब्रह्म मुहूर्त जैसा माना जाता है, जब आध्यात्मिक ऊर्जा चरम पर होती है। इस समय पूजा, भजन और ध्यान करने से भगवान कृष्ण से गहरा जुड़ाव महसूस होता है।
भारत के प्रमुख मंदिरों और इस्कॉन केंद्रों में कृष्ण जन्म का महा-आयोजन रात 12 बजे किया जाता है। इस दौरान बाल गोपाल का अभिषेक (दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से स्नान) कराया जाता है। उन्हें नए वस्त्र पहनाना, झूले में विराजमान करना और शंख और घंटियों की ध्वनि के बीच जन्म का स्वागत करना बेहद खास होता है। इस दौरान, भक्तों व्रत रखते हैं। यह सब मानो अपने घर में दिव्य बालक का स्वागत करने जैसा होता है।